Sunday, September 20, 2026

सेवा संकल्प अभियान 2026

किरणेश तिथि सप्त दश से मही पर राष्ट्र अर्चन दीप जला,
भाद्रपद के नव विहान से आश्विन तक यह दिव्य अनुष्ठान चला।
शरद वत्सर पंचविंशति की साधना से जग का हुआ भला,
श्रमिक स्वेद अंबु से सिंचित धरणी पर प्रकटी सेवा की कला।
ऊर्जस्वित नव तरुण बढ़े हैं नव्य इला का दिव्य श्रृंगार किए,
पावनता शुचिता समरसता का अंतस में दृढ़ संकल्प लिए।
शक्र धनुष से दीप्त विहान पर जाग उठी मानव की पावन प्रीत,
अखंड पुरुषार्थ की वेदी पर गूंज उठा सुंदर मंगल नव गीत।

Friday, September 4, 2026

शिक्षक वही है

       शिक्षक  वही है
जो तिमिर हरकर हृदय में, ज्ञान का नव भोर कर दे,
जो ढलते हुए संकल्प में, अटूट धैर्य और संबल भर दे।
परस्पर सहयोग की पावन रीती से, जो सबको जोड़ता है,
विपदाओं के थपेड़ों में भी, जो मुड़ना और लड़ना सिखाता है,
जो अज्ञान रूपी पाषाण को तराश कर गढ़ दे, वास्तव में शिक्षक वही है।

Saturday, October 18, 2025

रावण का उद्घोष: "मैं तुममें शेष हूँ"

काष्ठ और तृण के ढाँचे को, तुमने पावक में झोंक दिया,
लपटों की भीषण ज्वाला ने, मेरा नश्वर तन सोख लिया।
तुम विजय-नाद का दंभ लिए, हँसते हो अपनी अज्ञानता पर,
पर ध्यान से देखो राख मेरी, मैं आज भी तुममें शेष हूँ।
जो दंभ तुम्हारे मानस में, जो लोभ तुम्हारे नयनों में,
मैं श्वास ले रहा हूँ अब तक, उन काम-क्रोध के स्पंदनों में।
तुम जिसे मरा समझ बैठे हो, वह मेरा अंतकाल नहीं,
हर कलुषित सोच के साए में, मैं युग-युग से तुममें शेष हूँ।
तुम प्रतिवर्ष जलाते हो मुझे, अपनी दुर्बलता छिपाने को,
एक झूठे आत्म-संतोष तले, अंतस की मलीनता दबाने को।
जब तक ईर्ष्या, छल और कपट, इस मानव-मन का हिस्सा है,
तब तक यह रावण मरा नहीं, मैं जीवित ही तुममें शेष हूँ।
मत करो ढोंग इस विजय का, तुम पराजित हो अपने मन से,
मैं अमर तत्व बन व्याप रहा, इस कलयुग के कण-कण में।
जब तक न मिटेगी पाशविकता, तब तक मेरा अवसान नहीं,
पहचानो अपने भीतर मुझे, मैं तुममें शेष हूँ।
 

Tuesday, September 5, 2023

पर - कल्याण

क्षुधित कंठ, व्याकुल नयन, विप्रदा की है मार,
अकिंचनता के तिमिर में, सिसक रहा संसार।
सूनी छत और टूटा आँगन, सहते ठंडा घाम,
ग़रीबों का इस दुनिया में, कोई न लेता नाम।
पर-हित में जो जी सके, वही मनुज गतिमान,
सच्ची मानवता यही, जीवें पर-कल्याण।
औरों के हित जीना सीखो, छोड़ो स्वार्थ अपार,
दीन-हीन के कष्ट का, जो बन सके आधार।

Friday, November 18, 2022

प्राकृतिक का शाश्वत स्वर

क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर का यह पुतला है,
मानव का जीवन प्रकृति का रूप रूपहला है।
हृदय-विस्तार यहाँ अंबर की सुंदर भाँति है,
चंचल भावनाएँ मानो ऋतुओं की परिपाटी हैं।

तरल अभिलाषाएँ नदियाँ बन-बनकर बहती हैं,धैर्य-परिभाषाएँ अडिग शैल सी रहती हैं।
उर की तीव्र ज्वाला मुखरित दावानल बन जाती है,
ओस-कण सी करुणा जग को पावन कर जाती है।

प्राणों का स्पंदन मारुत की शीतल गति है,
काया की यह हलचल धरती की अंगड़ाई है।
मन की नीरवता नभ जैसी शांत और गहरी है,
आँखों की नीली आभा सागर सी ठहरी है।

मुख पर छाई रौनक कली नई सी लाई है,
साँसों में मलयज की मंद सुगंधि समाई है।
विचारों की ये लहरें प्रकृति की ही संधि हैं,
वाणी की गूँज मधुर पंछी सी आनंदी है।

मस्तक की भव्य ऊँचाई पर्वत का ही मान है,
सुख-दुख के दो तट जीवन-सरिता की शान हैं।
सृजन और संहार यहाँ ऋतु चक्र की संपति है,
माटी से जन्मी काया माटी की ही अमानत है।
पल-पल बदलता यह रूप प्रकृति का शाश्वत स्वर है,
पंचतत्व की यह देह, पंचतत्व में विलीन होना ही इसका नियम अमर है।

Saturday, October 17, 2020

सच की दस्तक ने मुझे उत्कृष्ट लेखन अवार्ड से सम्मानित किया उनका बहुत बहुत आभार 🙏🙏🙏



 

सद्भाव का सबेरा

   स्नेह-सलिल की बहें नदियाँ, मिटें द्वेष की मलिन घड़ियाँ। नीले नभ में प्रेम छाए, सारे जग में उजाला भर जाए। सत्य, सुसंस्कृत, सुंदर बोल, खोले...