क्षुधित कंठ, व्याकुल नयन, विप्रदा की है मार,
अकिंचनता के तिमिर में, सिसक रहा संसार।
अकिंचनता के तिमिर में, सिसक रहा संसार।
सूनी छत और टूटा आँगन, सहते ठंडा घाम,
ग़रीबों का इस दुनिया में, कोई न लेता नाम।
ग़रीबों का इस दुनिया में, कोई न लेता नाम।
पर-हित में जो जी सके, वही मनुज गतिमान,
सच्ची मानवता यही, जीवें पर-कल्याण।
सच्ची मानवता यही, जीवें पर-कल्याण।
औरों के हित जीना सीखो, छोड़ो स्वार्थ अपार,
दीन-हीन के कष्ट का, जो बन सके आधार।
दीन-हीन के कष्ट का, जो बन सके आधार।
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