SHIVRAJ ANAND
Saturday, July 25, 2026
Monday, March 3, 2025
शिवराज आनंद
नाम: शिवराज आनंद (मूल नाम: शिव कुमार साहू)
जन्म स्थान: सोनपुर, विकास खण्ड -रामानुज नगर
जिला -सूरजपुर छत्तीसगढ़ 497229
जन्म तिथि: 04 मई 1987
माता-पिता: विश्वनाथ और पार्वती
धर्म पत्नी: कृष्णी कुमारी
शिक्षा: स्नातक (हिंदी भाषा)
व्यवसाय: लेखक, कवि
शौक: पढ़ना, लिखना, खेलना
रुचि: साहित्य के प्रति
अनुभव: दो दशक से साहित्य लेखन
उपलब्धियां:
साहित्यिक रचनाएं:स्नातक
विधा – गद्य और पद्यसाहित्य कृतियां – जीवन की सोच, मेरी आवाज, जिओ उनके लिए, मां की महिमा, प्रेम -जगत, हम कलियुग के प्राणी हैं, घर का भेद, जगत का जंजाल -संसृति, यहां उनका भी दिल जोड़ दो, उठो युवा तुम उठो ऐसे, मानवता के डगर पे, बेवफा अपनों के लिए आदि।
- राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान 2020,
-सच की दस्तक(राष्ट्रीय मासिक पत्रिका) द्वारा'उत्कृष्ट लेखन सम्मान 2020
(सर्टिफिकेट नंबर 0084SKD)
- फेस ऑफ इंडिया अवार्ड 2021
- नेशनल आइकन अवार्ड 2022
- श्री राघव सामान 2024
- अंतर्राष्ट्रीय आइकन अवार्ड 2025
20 जुलाई 2026 को आडिटोरियम भवन सूरजपुर में आज की जनधारा अखबार के कार्यक्रम में सम्मानित ,स्मृति चिन्ह्
- अन्य कई साहित्य पत्रिकाओं में रचना का प्रकाशन
- , साहित्यपीडिया में ।
छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग रजिस्ट्रेशन नंबर-KSMLYU2019050238
LISAT202200002874
Saturday, January 11, 2025
Friday, April 7, 2023
Thursday, January 26, 2023
जीवन की सोच
"बाधाएँ और कठिनाइयाँ हमें रोकती नहीं, अपितु मज़बूत बनाती हैं।""लफ़्ज़ों से कैसे कहूँ कि मेरे जीवन की सोच क्या थी? आख़िर मैंने भी सोचा था कि पुलिस बनूँगा, डॉक्टर बनूँगा, किसी की सहायता करके ऊँचा नाम कमाऊँगा। पर नाम कमाने की बात तो दूर... ज़िंदगी ऐसे लड़खड़ा गई जैसे शीशे का टुकड़ा गिर पड़ा हो। फर्क इतना सा हो गया जितना जीव और निर्जीव में होता है। मैं क्यों निष्फल हुआ?हाँ, मैं जिस कार्य को करता था उसमें सफल होने की आशा नहीं करता था। मेहनत और लगन से जी चुराता था, इसलिए मेरी सोच पर पानी फिर गया। गुड़-गोबर हो गया। अगर मैंने मेहनत और लगन से जी लगाया होता, तो कोई भी मंज़िल पा सकता था, ऊँचा नाम कमा सकता था। अभी भी मेरे मन में कसक होती है जब वे लम्हें याद आते हैं और दिल के टुकड़े-टुकड़े कर जाते हैं कि काश, मैं उस दौर में समय की कीमत को जाना और समझा होता; जिस समय को यूँ ही खेल-कूद, मौज-मस्ती में लुटा दिया। बहरहाल, अब मैं गड़े मुर्दे उखाड़कर दिल को ठेस नहीं पहुँचाऊँगा... वरन् उन दिलों में नव-नींव डालकर भविष्य का सृजन करूँगा।"
"हाँ, मैं अल्पज्ञ हूँ, किंतु इतना साक्षर भी हूँ कि अच्छे और बुरे व्यक्ति की पहचान कर सकूँ। उन दोनों की तस्वीर समाज के सामने खींच सकूँ। फिर यह कह सकूँ कि सत्यवान और दुराचारी इंसान की सोच में ज़मीन और आसमान से भी अधिक अंतर होता है; चाहे क्यों न एक-दूजे का मिलन होता हो, मतभेद ज़रूर होता है।
उन दोनों की ख़्वाहिश अलग सी होती है, ख़्वाबों में पृथक-पृथक इरादे लाते हैं—सु-कृत्य और कु-कृत्य। सु-कृत्यों में जो स्थान किसी की सहायता करना, भूले-भटके हुए को वापस लाना या यह कहें कि ऐसे सुकर्म हैं जिनका फल सुखद होता है; वहीं कुकृत्य करने वाले की सोच किसी की ज़िल्लत करना, किसी पर इल्ज़ाम लगाने जैसे अशोभनीय और निंदनीय कर्मों में लगी रहती है।"
"सभी कर्मों का इतिहास 'कर्म साक्षी' है। फिर कैसे राजा लंकेश के कपट-कर्म और मन के कलुषित-भाव ने उसके साथ समूची लंका का पतन कर डाला। 'माना कि झूठ की आड़ से किसी की ज़िंदगी सलामत हो जाती है, तो उस वक्त के लिए झूठ बोलना सौ-सौ सत्य के समान है। परंतु निष्प्रयोजन मिथ्यात्व क्यों? फिर तो इस संसार में सत्य और सत्यवान की भी परीक्षा हुई है और सार्थक सोच की शक्ति ने विजय पाई है।'महापुरुष हों या साधारण व्यक्ति, सभी पारिवारिक स्थिति में मलिन होकर विषम परिस्थितियों में खोए रहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण 'जीवन की सोच' सत्कर्म में होनी चाहिए।मैं तो यह नहीं कह सकता कि सिर्फ सोच रखने से सदा आप सफल हो जाएँगे, किन्तु यदि मेहनत, लगन और विश्वास के साथ रहे, तो एक दिन चाँद-तारे भी तोड़ लाएँगे।कहीं आप भी ऐसा कार्य न कर बैठें कि बाद में आपको आठ-आठ आँसू रोना पड़े। आज मुझे मालूम हुआ कि जीवन की सोच कैसी होनी चाहिए। मैं तो असफल हुआ; ओस चाटने से मेरी प्यास नहीं बुझी। लेकिन आप ज्ञानवान हैं, सोच-समझकर कार्य करें। आत्मविश्वास और मन की एकाग्रता से काम लें, नहीं तो आपको भी आठ-आठ आँसू रोने पड़ेंगे।"
शिवराज आनंद
शिवराज आनंद
Sunday, August 15, 2021
Thursday, December 24, 2020
Tuesday, August 4, 2020
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