अज्ञानी हूँ,
बालक हूँ,तेरी चौखट पर आया हूँ।
बहुत दिनों के बाद आज फिर,मैंने यह कलम उठाई है।
तेरे चरणों की धूलि ही,मेरी असली कमाई है।
मन का यह अंधियारा माँ,तू ज्ञान-दीप से दूर कर।टूटे हुए इन शब्दों को,तू अपनी कृपा से पूर कर।
मौन रहा था अब तक मैं,अब फिर से साधना जारी है।
लिख सकूँ मैं पावन भाव,अब ऐसी मेरी तैयारी है।
मेरी कलम को ऐसी ताकत दे माँ,जो सोए हुए समाज को जगाए।
लिखूँ शब्द जब भी पन्नों पर,वह देश में नया बदलाव लाए।
अन्याय के आगे कभी न झुके,यह सच का सदा साथ निभाए।
मिटे भेद-भाव इस धरती से,यह प्रेम का ऐसा राग सुनाए।
कुरीतियों की बेड़ियाँ टूटे माँ,हर मन में नया विश्वास जगे।
मेरी स्याही से उपजे वह क्रांति,जिससे देश का हर नागरिक आगे बढ़े।
भ्रष्टाचार और अंधकार मिटे,यह न्याय की अलख जगाती रहे।
तेरी कृपा से मेरी यह लेखनी,सत्य और विकास का मार्ग दिखाती रहे।
हे माँ शारदे, दे ऐसा वरदान,मेरी वाणी में वह ओज भर दे।
देश और समाज के कल्याण हित,मेरी इस साधना को तू अमर कर दे






