भाद्रपद के नव विहान से आश्विन तक यह दिव्य अनुष्ठान चला।
शरद वत्सर पंचविंशति की साधना से जग का हुआ भला,
श्रमिक स्वेद अंबु से सिंचित धरणी पर प्रकटी सेवा की कला।
ऊर्जस्वित नव तरुण बढ़े हैं नव्य इला का दिव्य श्रृंगार किए,
पावनता शुचिता समरसता का अंतस में दृढ़ संकल्प लिए।
शक्र धनुष से दीप्त विहान पर जाग उठी मानव की पावन प्रीत,
अखंड पुरुषार्थ की वेदी पर गूंज उठा सुंदर मंगल नव गीत।



