Monday, August 17, 2026

सोनपुर

( कविता लामी पर्वत और नदियों के बीच बसे सोनपुर गाँव की सुंदरता, शिव भक्ति और आपसी भाईचारे को दिखाती है।) 

दंड पकड़ी प्राचीन धरोहर, नाम पूर्वज बतलाते।
सघन हरीतिमा देख, सोनपुर सब हर्षाते,
नदियाँ हैं त्रय ओर, घेर सुंदर जल लातीं।

पूर्व दिशा में पम्पापुर है, पश्चिम गोपीपुर आता,
उत्तर और दक्षिण में इसके, चंद्रपुर सीमा बनाता।

ग्राम मध्य पावन धरा, भव्य शिव मंदिर सोहे,
सार्वजनिक वह देव, सकल जन का मन मोहे।

सोमेश्वर ही नाम, लोक में पावन गाते,
सब समाज के लोग, जहाँ श्रद्धा से आते।

लामी घुटरी शीर्ष, देव का विग्रह आधा,
नीचे सुंदर ताल, मिटाता भू की बाधा।

।अति मनमोहक रूप, अन्य भी ताल वहाँ हैं,
लामी घुटरी पावन, पुण्य दृश्य जहाँ हैं।

लामी पर्वत शीर्ष पर, शिव का मंदिर दिव्य,
उत्पत्ति अज्ञात है, आदि-अनादि भव्य।

कब प्रकटे त्रिभुवन धनी, जाने ना कोई काल।
भक्त सुमरते नाम को, कटते सकल जंजाल,

लामी पर्वत शीर्ष से, अद्भुत छटा निहारें।
नीचे का सौंदर्य देख, मन खुद को वारें,

चारों ओर हरियाली चादर, नदियाँ कल-कल बहतीं।
प्रकृति की अनुपम गवाही, मौन शब्द में कहतीं,

पर्वत की ऊँचाई से, पूरा ग्राम सुहाता।
सोनपुर का विहंगम दृश्य, मन को है हर्षाता,

छोटे-छोटे घर दिखते, जैसे सजे सितारे।
स्वर्ग उतर आया धरती पर, लामी के द्वारे,

लामी घुटरी शिखर बैठ, विहगों का मेला सोहे।
नभ में उड़ते मुक्त गगन, सबका ही मन मोहे,

पंख पसारें नील गगन में, सुंदर राग सुनाते।
शीतल मंद समीर संग, वे लहरों पर इठलाते,

लामी घुटरी पर्वत पावन। 
महाकाल का रूप सुहावन ॥

शिखर विराजे शंकर स्वामी। 
संकट हरते अंतर्यामी ॥

नीचे सुंदर खेल मैदान। 
खेलें युवा बढ़ाकर शान ॥

नीचे बने जलाशयों पर, कलरव का स्वर गूँजे।
हरी डालियों पर बैठें, पावन तरुवर कुँजे,
पर्वत से पंछी सुंदर, असीम क्षितिज को छूते।

सोमेश्वर के पास, ताल अति पावन सोहे।
सुंदर प्रतीक्षालय बना, सबका मन मोहे 

श्रद्धालु जन बैठ, शांत मन ध्यान लगाते।
शिव-भक्ति के रंग, हृदय में सहज समाते,

बहता नीचे बाँध, सकल सुख वैभव लाता।
उच्च विद्यालय श्रेष्ठ, ज्ञान का दीप जलाता।

बहु-जाति समाज, साथ मिल मंगल करते,
राजनीतिक मतभेद, भुला सब आगे बढ़ते।

पंच-प्रधान सदैव ही, प्रजा हित काम कराते,
शासन और प्रशासन, जन का साथ निभाते।
सुख-समृद्धि का मार्ग, निरंतर सहज बनाते,

शिक्षक, विधिक-सुजान, वैद्य जन-जन को तारें।
ज्ञानी सब प्रभु जन, समाज का रूप संवारें,

ज्ञान, न्याय, सुज्ञान, सुशासन का यह डेरा।
शिव का साक्षात वास, धन्य सोनपुर मेरा,हर 

नवरात्रि सजता दरबार, बोए जाते पावन ज्वारा,
सोनपुर के इस देवालय में, बहे भक्ति की अविरल धारा।

आगे आने वाली, पीढ़ी से यह आशा।
रखे अक्षुण्ण सदा, गौरव की परिभाषा,

संस्कृति और सुरीति, एकता सदा बचाए।
सोनपुर की पावन, कीर्ति जग में फैलाए।

शिवराज आनंद आज, ग्राम का गौरव गाते।
सुंदर अनुपम दृश्य, देख मन में हर्षाते,।
(कुल मात्राएँ: 12 + 19 = 31 मात्राएँ)

Wednesday, August 12, 2026

आज फिर तेरी साधना में

भूल गया था राह मैं माँ,फिर वापस आज आया हूँ।
अज्ञानी हूँ, 
बालक हूँ,तेरी चौखट पर आया हूँ।

बहुत दिनों के बाद आज फिर,मैंने यह कलम उठाई है।
तेरे चरणों की धूलि ही,मेरी असली कमाई है।

मन का यह अंधियारा माँ,तू ज्ञान-दीप से दूर कर।टूटे हुए इन शब्दों को,तू अपनी कृपा से पूर कर।

मौन रहा था अब तक मैं,अब फिर से साधना जारी है।
लिख सकूँ मैं पावन भाव,अब ऐसी मेरी तैयारी है।

मेरी कलम को ऐसी ताकत दे माँ,जो सोए हुए समाज को जगाए।
लिखूँ शब्द जब भी पन्नों पर,वह देश में नया बदलाव लाए।

अन्याय के आगे कभी न झुके,यह सच का सदा साथ निभाए।
मिटे भेद-भाव इस धरती से,यह प्रेम का ऐसा राग सुनाए।

कुरीतियों की बेड़ियाँ टूटे माँ,हर मन में नया विश्वास जगे।
मेरी स्याही से उपजे वह क्रांति,जिससे देश का हर नागरिक आगे बढ़े।

भ्रष्टाचार और अंधकार मिटे,यह न्याय की अलख जगाती रहे।
तेरी कृपा से मेरी यह लेखनी,सत्य और विकास का मार्ग दिखाती रहे।

हे माँ शारदे, दे ऐसा वरदान,मेरी वाणी में वह ओज भर दे।
देश और समाज के कल्याण हित,मेरी इस साधना को तू अमर कर दे

Monday, March 3, 2025

शिवराज आनंद

नाम: शिवराज आनंद (मूल नाम: शिव कुमार साहू)
जन्म स्थान: सोनपुर, विकास खण्ड -रामानुज नगर 
जिला -सूरजपुर छत्तीसगढ़ 497229
जन्म तिथि: 04 मई 1987
माता-पिता: विश्वनाथ और पार्वती
धर्म पत्नी: कृष्णी कुमारी
शिक्षा: स्नातक (हिंदी भाषा)
व्यवसाय: लेखक, कवि
शौक: पढ़ना, लिखना, खेलना
रुचि: साहित्य के प्रति
अनुभव: दो दशक से साहित्य लेखन
उपलब्धियां:
साहित्यिक रचनाएं:स्नातक
विधा – गद्य और पद्य
साहित्य कृतियां – जीवन की सोच, मेरी आवाज, जिओ उनके लिए, मां की महिमा, प्रेम -जगत, हम कलियुग के प्राणी हैं, घर का भेद, जगत का जंजाल -संसृति, यहां उनका भी दिल जोड़ दो, उठो युवा तुम उठो ऐसे, मानवता के डगर पे, बेवफा अपनों के लिए ,सोनपुर महिमा काव्य,गौरव सूरजपुर का (कविता)आदि।
- राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान 2020,
 -सच की दस्तक(राष्ट्रीय मासिक पत्रिका) द्वारा'उत्कृष्ट लेखन सम्मान 2020
(सर्टिफिकेट नंबर 0084SKD)
- फेस ऑफ इंडिया अवार्ड 2021
- नेशनल आइकन अवार्ड 2022
- श्री राघव सामान 2024
- अंतर्राष्ट्रीय आइकन अवार्ड 2025
20 जुलाई 2026 को आडिटोरियम भवन सूरजपुर में आज की जनधारा अखबार के कार्यक्रम में सम्मानित ,स्मृति चिन्ह्
- अन्य कई साहित्य पत्रिकाओं में रचना का प्रकाशन
- , साहित्यपीडिया में । 
छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग रजिस्ट्रेशन नंबर-KSMLYU2019050238
LISAT202200002874
 

Friday, April 7, 2023

देवगढ़ धाम का सावन मेलें

                 ।।देवगढ़ ।।
रेणुका के कछारों पर अंकित, देवगढ़ का वैभव अचल है,
यमदग्नि-परशुराम की तप-ऊर्जा से, इसका अंतस सजल है।

मातृ-नाम धारिणी सरिता का, कलकल नाद यहाँ गूँजता,
युग-युगांतर से आदि सनातन, इस रज को आकर पूजता।

दशरथ-नंदन के वन-पथ का, यह मूक गवाह पुरातन है,
प्रभु-चरण-चिन्हों को सँजोए, यह सुपावन तपोवन है।

गौरी-शंकर का शैल-शिखर, कला-संस्कृति का अप्रतिम मान,
जहाँ अर्धनारीश्वर विग्रह में, शिव-शिवा का एकाकार महान।

एकादश रुद्रों के प्रांगण में, समय का चक्र निर्बाध चला,
कालगति से भग्नावशेष बने, पर जीवंत है यहाँ शिल्पकला।

गोल्फी मठ की प्राचीरों में, शैव-दर्शन का गौरव मौन,
इस दिव्य पुरातात्विक गरिमा का, इतिहास लिखेगा भला कौन?

कल-कल नादिनी रेणुका सरिता के, पावन और शीतल घाटों पर,
एकत्रित होता जन-सैलाब, उमड़ता भक्ति-भाव इन तटों पर।

कर-कमलों में ले ताम्र-पात्र, सुपावन मंत्रों का पाठ करें,
रेणुका मैया को नमन कर, काँवर में जल-अभिषेक भरें।

गंगा-सम पावन इस जल को, अंजलि में भर संकल्प लिया,
शिव-शंभू के अर्चन हेतु, मन को पूर्णतः समर्पित किया।

उठती तरंगें सरिता की, देतीं भक्तों को शुभाशीष अमित,
लेकर काँवर जल-धार चले, सब शिव-चरणों में होने विनीत।

श्रावण की रिमझिम फुहारों में, सजता यहाँ अनुपम कौतुक-मेला,
अंस पर काँवर सुसज्जित कर, बढ़ता शिव-भक्तों का अविरल रेला।

जयघोषों और मंत्रोच्चार संग, प्रवाहित श्रद्धा का निर्मल नीर,
आशुतोष के चरणों में अर्पने, बढ़ते निश्चल पग धीर-वीर।

जब सघन विभावरी ढलती इस पर, 
गूँजते सनातन पावन स्वर,'
हर-हर महादेव' के महामंत्र से, गुंजायमान होता अंबर।

लब्धप्रतिष्ठित सुरमयी गायक आकर, पीयूष-भजन-रस बरसाते,
श्रोतागण सब मंत्रमुग्ध हो,
 शिव-भक्ति-सिंधु में डूब जाते।

शिवराज आनंद की लेखनी गाती, इस पावन धरा का दिव्य गान,
अध्यात्म और पुरा-वैभव का, देवगढ़ रूप अत्यंत भव्य और महान।
(कुल मात्राएँ: 18 + 16 = 34 मात्राएँ)

Thursday, January 26, 2023

जीवन की सोच

"बाधाएँ और कठिनाइयाँ हमें रोकती नहीं, अपितु मज़बूत बनाती हैं।"
      
 
"लफ़्ज़ों से कैसे कहूँ कि मेरे जीवन की सोच क्या थी? आख़िर मैंने भी सोचा था कि पुलिस बनूँगा, डॉक्टर बनूँगा, किसी की सहायता करके ऊँचा नाम कमाऊँगा। पर नाम कमाने की बात तो दूर... ज़िंदगी ऐसे लड़खड़ा गई जैसे शीशे का टुकड़ा गिर पड़ा हो। फर्क इतना सा हो गया जितना जीव और निर्जीव में होता है। मैं क्यों निष्फल हुआ?
हाँ, मैं जिस कार्य को करता था उसमें सफल होने की आशा नहीं करता था। मेहनत और लगन से जी चुराता था, इसलिए मेरी सोच पर पानी फिर गया। गुड़-गोबर हो गया। अगर मैंने मेहनत और लगन से जी लगाया होता, तो कोई भी मंज़िल पा सकता था, ऊँचा नाम कमा सकता था। अभी भी मेरे मन में कसक होती है जब वे लम्हें याद आते हैं और दिल के टुकड़े-टुकड़े कर जाते हैं कि काश, मैं उस दौर में समय की कीमत को जाना और समझा होता; जिस समय को यूँ ही खेल-कूद, मौज-मस्ती में लुटा दिया। बहरहाल, अब मैं गड़े मुर्दे उखाड़कर दिल को ठेस नहीं पहुँचाऊँगा... वरन् उन दिलों में नव-नींव डालकर भविष्य का सृजन करूँगा।" "हाँ, मैं अल्पज्ञ हूँ, किंतु इतना साक्षर भी हूँ कि अच्छे और बुरे व्यक्ति की पहचान कर सकूँ। उन दोनों की तस्वीर समाज के सामने खींच सकूँ। फिर यह कह सकूँ कि सत्यवान और कुटेव  की सोच में ज़मीन और आसमान से भी अधिक अंतर होता है; चाहे क्यों न एक-दूजे का मिलन होता हो, मतभेद ज़रूर होता है।
उन दोनों की ख़्वाहिश अलग सी होती है, ख़्वाबों में पृथक-पृथक इरादे लाते हैं—सु-कृत्य और कु-कृत्य। सु-कृत्यों में जो स्थान किसी की सहायता करना, भूले-भटके हुए को वापस लाना या यह कहें कि ऐसे सुकर्म हैं जिनका फल सुखद होता है; वहीं कुकृत्य करने वाले की सोच किसी की ज़िल्लत करना, किसी पर इल्ज़ाम लगाने जैसे अशोभनीय और निंदनीय कर्मों में लगी रहती है।" 
        
      "सभी कर्मों का इतिहास 'कर्म साक्षी' है। फिर कैसे राजा लंकेश के कपट-कर्म और मन के कलुषित-भाव ने उसके साथ समूची लंका का पतन कर डाला। 'माना कि झूठ की आड़ से किसी की ज़िंदगी सलामत हो जाती है, तो उस वक्त के लिए झूठ बोलना सौ-सौ सत्य के समान है। परंतु निष्प्रयोजन मिथ्यात्व क्यों? फिर तो इस संसार में सत्य और सत्यवान की भी परीक्षा हुई है और सार्थक सोच की शक्ति ने विजय पाई है।'महापुरुष हों या साधारण व्यक्ति, सभी पारिवारिक स्थिति में मलिन होकर विषम परिस्थितियों में खोए रहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण 'जीवन की सोच' सत्कर्म में होनी चाहिए।मैं तो यह नहीं कह सकता कि सिर्फ सोच रखने से सदा आप सफल हो जाएँगे, किन्तु यदि मेहनत, लगन और विश्वास के साथ रहे, तो एक दिन चाँद-तारे भी तोड़ लाएँगे।कहीं आप भी ऐसा कार्य न कर बैठें कि बाद में आपको आठ-आठ आँसू रोना पड़े। आज मुझे मालूम हुआ कि जीवन की सोच कैसी होनी चाहिए। मैं तो असफल हुआ; ओस चाटने से मेरी प्यास नहीं बुझी। लेकिन आप ज्ञानवान हैं, सोच-समझकर कार्य करें। आत्मविश्वास और मन की एकाग्रता से काम लें, नहीं तो आपको भी आठ-आठ आँसू रोने पड़ेंगे।"

                              शिवराज आनंद 


राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान 2020

Saturday, October 17, 2020

सच की दस्तक ने मुझे उत्कृष्ट लेखन अवार्ड से सम्मानित किया उनका बहुत बहुत आभार 🙏🙏🙏



 

सोनपुर

( कविता लामी पर्वत और नदियों के बीच बसे सोनपुर गाँव की सुंदरता, शिव भक्ति और आपसी भाईचारे को दिखाती है।)  दंड पकड़ी प्राचीन धरोहर, नाम पूर्व...