( कविता लामी पर्वत और नदियों के बीच बसे सोनपुर गाँव की सुंदरता, शिव भक्ति और आपसी भाईचारे को दिखाती है।)
दंड पकड़ी प्राचीन धरोहर, नाम पूर्वज बतलाते।
सघन हरीतिमा देख, सोनपुर सब हर्षाते,
नदियाँ हैं त्रय ओर, घेर सुंदर जल लातीं।
नदियाँ हैं त्रय ओर, घेर सुंदर जल लातीं।
पूर्व दिशा में पम्पापुर है, पश्चिम गोपीपुर आता,
उत्तर और दक्षिण में इसके, चंद्रपुर सीमा बनाता।
उत्तर और दक्षिण में इसके, चंद्रपुर सीमा बनाता।
ग्राम मध्य पावन धरा, भव्य शिव मंदिर सोहे,
सार्वजनिक वह देव, सकल जन का मन मोहे।
सार्वजनिक वह देव, सकल जन का मन मोहे।
सोमेश्वर ही नाम, लोक में पावन गाते,
सब समाज के लोग, जहाँ श्रद्धा से आते।
सब समाज के लोग, जहाँ श्रद्धा से आते।
लामी घुटरी शीर्ष, देव का विग्रह आधा,
नीचे सुंदर ताल, मिटाता भू की बाधा।
नीचे सुंदर ताल, मिटाता भू की बाधा।
।अति मनमोहक रूप, अन्य भी ताल वहाँ हैं,
लामी घुटरी पावन, पुण्य दृश्य जहाँ हैं।
लामी पर्वत शीर्ष पर, शिव का मंदिर दिव्य,
उत्पत्ति अज्ञात है, आदि-अनादि भव्य।
उत्पत्ति अज्ञात है, आदि-अनादि भव्य।
कब प्रकटे त्रिभुवन धनी, जाने ना कोई काल।
भक्त सुमरते नाम को, कटते सकल जंजाल,
लामी पर्वत शीर्ष से, अद्भुत छटा निहारें।
नीचे का सौंदर्य देख, मन खुद को वारें,
नीचे का सौंदर्य देख, मन खुद को वारें,
चारों ओर हरियाली चादर, नदियाँ कल-कल बहतीं।
प्रकृति की अनुपम गवाही, मौन शब्द में कहतीं,
पर्वत की ऊँचाई से, पूरा ग्राम सुहाता।
सोनपुर का विहंगम दृश्य, मन को है हर्षाता,
सोनपुर का विहंगम दृश्य, मन को है हर्षाता,
छोटे-छोटे घर दिखते, जैसे सजे सितारे।
स्वर्ग उतर आया धरती पर, लामी के द्वारे,
लामी घुटरी शिखर बैठ, विहगों का मेला सोहे।
नभ में उड़ते मुक्त गगन, सबका ही मन मोहे,
नभ में उड़ते मुक्त गगन, सबका ही मन मोहे,
पंख पसारें नील गगन में, सुंदर राग सुनाते।
शीतल मंद समीर संग, वे लहरों पर इठलाते,
नीचे बने जलाशयों पर, कलरव का स्वर गूँजे।
हरी डालियों पर बैठें, पावन तरुवर कुँजे,
पर्वत से पंछी सुंदर, असीम क्षितिज को छूते।
हरी डालियों पर बैठें, पावन तरुवर कुँजे,
पर्वत से पंछी सुंदर, असीम क्षितिज को छूते।
सोमेश्वर के पास, ताल अति पावन सोहे।
सुंदर प्रतीक्षालय बना, सबका मन मोहे
श्रद्धालु जन बैठ, शांत मन ध्यान लगाते।
शिव-भक्ति के रंग, हृदय में सहज समाते,
बहता नीचे बाँध, सकल सुख वैभव लाता।
उच्च विद्यालय श्रेष्ठ, ज्ञान का दीप जलाता।
उच्च विद्यालय श्रेष्ठ, ज्ञान का दीप जलाता।
बहु-जाति समाज, साथ मिल मंगल करते,
राजनीतिक मतभेद, भुला सब आगे बढ़ते।
राजनीतिक मतभेद, भुला सब आगे बढ़ते।
पंच-प्रधान सदैव ही, प्रजा हित काम कराते,
शासन और प्रशासन, जन का साथ निभाते।
शासन और प्रशासन, जन का साथ निभाते।
सुख-समृद्धि का मार्ग, निरंतर सहज बनाते,
शिक्षक, विधिक-सुजान, वैद्य जन-जन को तारें।
ज्ञानी सब प्रभु जन, समाज का रूप संवारें,
ज्ञानी सब प्रभु जन, समाज का रूप संवारें,
ज्ञान, न्याय, सुज्ञान, सुशासन का यह डेरा।
शिव का साक्षात वास, धन्य सोनपुर मेरा,
आगे आने वाली, पीढ़ी से यह आशा।
रखे अक्षुण्ण सदा, गौरव की परिभाषा,
रखे अक्षुण्ण सदा, गौरव की परिभाषा,
संस्कृति और सुरीति, एकता सदा बचाए।
सोनपुर की पावन, कीर्ति जग में फैलाए।
सोनपुर की पावन, कीर्ति जग में फैलाए।
शिवराज आनंद आज, ग्राम का गौरव गाते।
सुंदर अनुपम दृश्य, देख मन में हर्षाते,
सुंदर अनुपम दृश्य, देख मन में हर्षाते,






