Saturday, October 17, 2020
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सद्भाव का सबेरा
स्नेह-सलिल की बहें नदियाँ, मिटें द्वेष की मलिन घड़ियाँ। नीले नभ में प्रेम छाए, सारे जग में उजाला भर जाए। सत्य, सुसंस्कृत, सुंदर बोल, खोले...
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जियो उनके लिए मेरे जीने की आस ज़िंदगी से कोसों दूर चली गई थी कि अब मेरा कौन है? मैं किसके लिए अपना आंचल पसारूँगा? पर देखा—लोक-लोचन में असी...
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हम कलियुग के प्राणी हैं सतयुग, त्रेता न द्वापर के, हम कलयुग के प्राणी हैं। हम सा प्राणी है किस युग में? हम अधमदेह धारी हैं।। ह...
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प्रेम-जगत १ ( 'प्रेम-जगत' संसार का रंगमंच है और हम सभी इस रंगमंच के पात्र हैं।) विज्ञों का ऐसा मत है कि प्रेम की आग की उष्णता से सृ...


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