क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर का यह पुतला है,
मानव का जीवन प्रकृति का रूप रूपहला है।
हृदय-विस्तार यहाँ अंबर की सुंदर भाँति है,
चंचल भावनाएँ मानो ऋतुओं की परिपाटी हैं।
मानव का जीवन प्रकृति का रूप रूपहला है।
हृदय-विस्तार यहाँ अंबर की सुंदर भाँति है,
चंचल भावनाएँ मानो ऋतुओं की परिपाटी हैं।
तरल अभिलाषाएँ नदियाँ बन-बनकर बहती हैं,धैर्य-परिभाषाएँ अडिग शैल सी रहती हैं।
उर की तीव्र ज्वाला मुखरित दावानल बन जाती है,
ओस-कण सी करुणा जग को पावन कर जाती है।
ओस-कण सी करुणा जग को पावन कर जाती है।
प्राणों का स्पंदन मारुत की शीतल गति है,
काया की यह हलचल धरती की अंगड़ाई है।
मन की नीरवता नभ जैसी शांत और गहरी है,
आँखों की नीली आभा सागर सी ठहरी है।
काया की यह हलचल धरती की अंगड़ाई है।
मन की नीरवता नभ जैसी शांत और गहरी है,
आँखों की नीली आभा सागर सी ठहरी है।
मुख पर छाई रौनक कली नई सी लाई है,
साँसों में मलयज की मंद सुगंधि समाई है।
विचारों की ये लहरें प्रकृति की ही संधि हैं,
वाणी की गूँज मधुर पंछी सी आनंदी है।
साँसों में मलयज की मंद सुगंधि समाई है।
विचारों की ये लहरें प्रकृति की ही संधि हैं,
वाणी की गूँज मधुर पंछी सी आनंदी है।
मस्तक की भव्य ऊँचाई पर्वत का ही मान है,
सुख-दुख के दो तट जीवन-सरिता की शान हैं।
सृजन और संहार यहाँ ऋतु चक्र की संपति है,
माटी से जन्मी काया माटी की ही अमानत है।
सुख-दुख के दो तट जीवन-सरिता की शान हैं।
सृजन और संहार यहाँ ऋतु चक्र की संपति है,
माटी से जन्मी काया माटी की ही अमानत है।
पल-पल बदलता यह रूप प्रकृति का शाश्वत स्वर है,
पंचतत्व की यह देह, पंचतत्व में विलीन होना ही इसका नियम अमर है।
पंचतत्व की यह देह, पंचतत्व में विलीन होना ही इसका नियम अमर है।