Sunday, October 26, 2014

प्रेम - जगत १

प्रेम-जगत १
( 'प्रेम-जगत' संसार का रंगमंच है और हम सभी इस रंगमंच के पात्र हैं।)
विज्ञों का ऐसा मत है कि प्रेम की आग की उष्णता से सृष्टि की रचना हुई है। मनु और शतरूपा ने भाव-संवेदन से धड़कती 'प्रेम-भावना' के लिए, स्वर्ग के संवेदन-हित 'आनंद-रस' को नहीं, अपितु जगत के कठोर जीवन को अपनाया। 'ढोला-मारू, लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट और हीर-रांझा' की प्रेम-कथाएं तो यही रेखांकित करती हैं कि प्रेम ही जीवन का सार है, और प्रेम-विहीन जगत वीरान है। इसी प्रेम के वशीभूत होकर जगत बनाने वाले माता (प्रकृति) व पिता (पुरुष) ने जगत का निर्माण किया। अतः, उन्हें मेरा सहस्रों बार प्रणाम!
पारिवारिक सुख आकाश में घटाओं के सदृश होता है। सुख उत्पन्न तो होता है, पर चिरकाल तक स्थिर नहीं रहता; वह उन घटाओं के सदृश ही छिप जाता है।
   "वर्षों से मेरे आँगन में एक 'अंगना' (स्त्री) नहीं है, जिससे मेरा आँगन सूना है।" ऐसा ही विचार करके 'मनीलाल' अपने पुत्र (मधुसूदन) का विवाह कर रहे हैं। असल बात यह है कि मधुसूदन जब दस वर्ष का था, तब उसकी 'जन्म-जननी' दुनिया से चल बसी थीं। वह माँ की ममता को न पा सका; माँ की ममता उसके लिए आसमान के कुसुम जैसी हो गई।'मनीलाल' मंजोलगढ़ के एक ईमानदार पुरुष हैं। वे सबको 'एक आँख' से देखते हैं। पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी आँखों में खून उतर आता था; बस याद आती, तो कमर टूट जाती थी। बस उसी याद को भुलाने और दुःख के आँसुओं को सुख में बदलने के लिए ही वे अपने पुत्र का विवाह कर रहे हैं।मधुसूदन का विवाह सुमन के साथ हो रहा है। 'सुमन' एक सजीली लड़की है। वह विदित नारायण की पुत्री है। 'विदित नारायण' भले व नेक इंसान हैं। वे 'प्रेमगढ़' के कुशल व्यक्ति हैं। आखिरकार एक दिन मधुसूदन की बारात प्रेमगढ़ के लिए निकल पड़ती है और लोगों के इंतजार की घड़ियाँ खत्म हो जाती हैं।
       'प्रेमगढ़' एक मनभावन नगर है। , किन्तु 'मधुसूदन' की बारात ने उस नगर की ओर सजा दिया है उस जन -संकुल नगर में अति चहल - पहल है । मधुसूदन के माथे पर सुन्दर सेहरा है । जिससे मधुसूदन अति प्रसन्नचित है । वहां का विशद् ए नूर अनुपम है । धरती से आसमा तक शहनाइयों की ध्वनि गूंज रही है , तारे - गण आकाश में टिमटिमा रहे हैं मानों सबके खुशीयों में झूम रहे हों । (कुछ देर बाद) पुरोहितों द्वारा शिव ,गौरी व गणेश जी की पूजा कराइ जा रही है। वहीं सुहागिन स्त्रियों मंगल गान गा रहीं हैं । जिससे आये सभी कुटुम्ब जन आनंदित हो रहे हैं। (धीरे- धीरे द्वार चार की रीति- रस्म पूर्ण हो जाती हैं) वही एक सुंदर जनवास है जिसमे आये सभी बारातियों की मंडली क्रमशः बैठी है। उन सबकी नज़र (सामने) दूल्हे और दुल्हन पर एक टक लगी हैं । 'वे' सब उनके मुस्कान भरे चेहरे को देखकर बरबस ही मोहित हो रहें हैं। ख़ैर सुंदरता किसे नही मोहित कर लेती । 
       आज'सुमन' बारहों आभूषणों से सजी है। उसके पैरों में नूपुर के साथ किंकिणी है। उसके हाथों में कंगन के साथ चूड़ियाँ हैं। उसके गले में कंठश्री है। बाहों में बसेर-बिरिया के साथ बाजूबंद है। माथे पर सुंदर टीके के साथ शीश पर शीशफूल है। उसे देखकर ऐसा लग रहा है, मानो 'सुमन' नंदनवन की परी हो, जहाँ शृंगार-रस और सौंदर्य का मिलन हुआ हो।अब प्रभात की सुमधुर बेला में 'सुमन' और 'मधुसूदन' सात फेरों के पवित्र बंधन में बंध रहे हैं। उनके इस बंधन के साक्षी अग्निदेव हैं। वहीं, अपने कुल के अनुसार लाई-परछन और नेक-चार की रीतियाँ-रस्में पूर्ण हो रही हैं। हालांकि 'सुमन' का अपना कोई भाई नहीं है, फिर भी 'मंगला' नाम का व्यक्ति इसे अपना सौभाग्य मानकर अपने हाथों से सुंदर संबंध निभा रहा है; मानो सीता जी के लिए पृथ्वी के पुत्र मंगल ग्रह स्वयं आए हों।शनैः-शनैः विदाई की पुनीत घड़ी आन पड़ी है, जहाँ पूजनीय पिता 'विदित नारायण' के पाँव नहीं उठ रहे हैं और वे टस से मस नहीं हो पा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, माँ 'सुनैना' की ममता टूटकर बिखरी पड़ी है।'प्रेम-जगत' का प्रेम ही अजूबा है। जब 'सुमन' अपने पति के गले में वरमाला डाल रही थी, तब सबकी आँखें एकटक होकर उसकी ओर देख रही थीं। परंतु, अब सबकी आँखें नम हैं। किसी के मुख से कोई शब्द बोलते नहीं बन रहा है, मानो सौंदर्य ने शृंगार-रस छोड़कर शांत-रस को अपना लिया हो। जो 'सुमन' कल तक अपनी सखी-सहेलियों की प्रिया थी, अपने बाबुल की गुड़िया थी और बाबुल की प्रीत रूपी बाहों में झूलकर कली से सुमन बनी थी... आज वही सुमन बाबुल की प्रीत में मुरझाकर विदा हो रही है। खैर, बगैर मुरझाए सुमन को बहारों का सुख कहाँ मिलेगा? जब तक इस जगत में प्रेम रहेगा... तब तक सुमन को बहारों का सुख मिलता रहेगा।चंद लम्हों के बाद विदित नारायण अपने दिल के टुकड़े को विदा कर देते हैं। 'सुमन' आँखों ही आँखों में देखते-देखते प्रेमांगन से दूर चली जाती है।
                        प्रेम -जगत २
'मनीलाल' कृत- कृत्य हो गए , जो उनके वर्षो की सुनी आंगन में' सुमन 'का जो आगमन हुआ । इस जगत में प्रेम भी अपने वेष को बदलता रहता है । जो 'मनीलाल' कल तक लोगों की सलामती की कामना करते थे, वही 'मनीलाल' अनायास ही परलोक सिधार गए। सारा सुख, दुःख में बदल गया। जहाँ मधुसूदन की जिंदगी चाँदनी रातों के समान दमक रही थी, अब वहाँ खौफनाक अंधेरा छा गया है—सिर्फ अंधेरा… अब तो मधुसूदन पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा है। "अगर उसके मन में प्रसन्नता होती, तो रात का घना अंधेरा भी दीप्त हो उठता"; किन्तु यदि चाँदनी रातों पर ही दुःखों का साया पड़ जाए, तो उसे भला कौन रोशन करेगा?वहाँ मधुसूदन बिलख-बिलखकर रो रहा है। शोक की इस बेला में वहाँ एकत्र हुए सभी सज्जन विमन हैं। उन्हें  मधुसूदन का यह कारुणिक विलाप अच्छा नहीं लगता  वे कह उठते हैं -"मत रो मधुसूदन! जो होनहारी है,वह तो होगा ही।इस संसार में संयोग से मिलन होता है और वियोग से बिछड़ना। हाँ मधुसूदन यह जिन्दगी केवल रुदन के लिए नहीं है;जीवन का प्रवाह जैसा बहता है,तू बहने दे। किन्तु तू मत रो, रोना जगत के लिए पाप है।मृत्यु ही इस नश्वर संसार का अंतिम और शाश्वत सत्य है। यह रोने की घड़ी नहीं है। बाल्यकाल में जिन कंधो को हांथी, घोड़ा और पालकी बनाकर अपार आनंद उठाया था,आज उन्हीं कंधो का ऋण (मोल) अदा करना है। इसलिए तुम अपने पिता(मनीलाल )को कंधा दो।"
 मनीलाल केसिधारते ही घर की आर्थिक स्थिति दुरुस्त नहीं रही। जहाँ मधुसूदन ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहा था... अब वहीं वह पहाड़ खोद-खोदकर चुहिया निकालने लगा, जिससे प्रेम-जाल में बँधी पत्नी (सुमन) और पुत्र का पेट पल सके।आखिरकार एक दिन मधुसूदन घर की स्थिति को दुरुस्त करने के लिए घर से निकल गया, बहुत दूर... वह अपने जान से प्यारे पुत्र को ममत्व की छाँव में छोड़ गया, जहाँ माँ (सुमन) की ममता अपार थी और पुनीत गोद विशाल।ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है। जब मधुसूदन दो वर्ष तक घर नहीं आया, तब 'सुमन' नयन-जल लिए विलापने लगी— "ओह देव! क्या मेरे पतिदेव जगत में कुशल भी हैं या आपने उनसे मेरा नाता तोड़ दिया?" वह एक तरफ स्तम्भित होकर भगवान को दोष देती, तो वहीं दूसरी तरफ अनुसूया जैसी पतिव्रता नारी के धर्म का पालन भी करती।पर उसे मालूम नहीं कि इस संसार में कोई किसी को दुःख देने वाला नहीं है, सब अपने ही कर्मों का फल है। 'सुमन' चारदीवारी के बाहर, विवर्ण मुख और अधःशिर किए बैठी है। उसकी आँखें नम हैं व केश विच्छिन्न हैं, जिससे उसका मुख ढका है। है।" सूर्य की लालिमा उसके तन पर पड़ रही है, तब भी वह दुखों के काले सागर में डूबी जा रही है; मानो अब उस अबला के लिए तड़पना ही उसका सफर बन गया हो। वह जैसे पति-प्रतीक्षा में बिकल है, वैसे ही प्रकृति भी अपनी अनमोल छटा से विचल है। वह बार-बार विधाता को दोष देती है और कहती है— "हाँ देव! तू सच-सच बता... तूने मेरे ख्वाबों और इरादों को पत्थर तो नहीं बना दिया? क्या सूर्य के बिना दिन और चंद्रमा के बिना रात शोभा पा सकते हैं? नहीं न... फिर मैं अपने पति के बिना कैसे शोभा पा सकती हूँ? क्या तुझे एक-दूजे की जुदाई का तजुर्बा नहीं? अगर नहीं, तो इस 'प्रेम-जगत' में 'आ'... और आकर देख... तेरी बनाई इस कठोर धरती पर, तेरा यह मिट्टी का खिलौना (पुतला) प्रेम के लिए कितना 'अधीर' है कि काश हमें मुट्ठी भर प्रेम मिल जाता, तो हमारे इस मिट्टी के खिलौने में जान आ जाती।"आगे वह कहने लगी— "जब 'अब दिन फिरेंगे' तो मैं जी भरकर देखूँगी। हाँ देव! अब विलम्ब न कर... उन्हें घर की चौखट तक ला दे। यह तुमसे मेरा आर्तनाद है और एक दुहाई भी। हाँ, लोगों को यह भ्रम है कि मैंने अपने पति (मधुसूदन) को घर से तू-तू, मैं-मैं करके और मुँह फुलाकर निकाल दिया है; पर तुम तो सर्वज्ञ हो, तुम्हें मालूम है कि मैंने उन्हें सप्रेम गले मिलकर किस्मत बनाने और जिंदगी सँवारने के लिए भेजा है।"
  अतः ये आँखें उनकी प्रतीक्षा में कब से राह सजाए खड़ी हैं। अंततः एक दिन मधुसूदन बीते हुए मौसम की तरह अपनी पत्नी सुमन के पास लौट आया और पति से गले लगते ही सुमन झूम उठी; मानो बहारों के आने पर मुरझाई कली खिल रही हो।
मधुसूदन ने हँसते हुए पूछा— "क्या हुआ सुमन? तुम इतनी बेचैन क्यों हो? क्या मैं इस 'प्रेम-जगत' में आकर सचमुच खो गया था? अगर हाँ, मैं खो गया था, तो क्या मेरा प्रेम भी इस जगत से खो गया था?" इन सवालों के जवाब सुमन न दे सकी और अपनी बहारों में महकने लगी।
                                         शिवराज आनंद
     


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