चेतना की लौ
शरद-अमावस्या की सघन कालिमा को चुनौती देती अट्टालिकाएं कृत्रिम विद्युत-रश्मियों से चकाचौंध थीं। उसी वैभव के छोर पर, वृद्ध कुम्हार माधव अपनी जीर्ण कुटिया के सम्मुख मिट्टी के अवशिष्ट दीपकों को निहार रहा था।
आधुनिकता की होड़ में उसकी माटी की कला उपेक्षित थी। तभी वहाँ से गुजरते एक अशांत, संपन्न व्यवसायी ने कौतुकवश पूछा, "वृद्ध! इस चकाचौंध के युग में इन तुच्छ दीयों का क्या औचित्य?"
माधव ने मंद मुसकाकर कहा, "महाभाग! यह कृत्रिम आभा केवल भित्तियों को चमकाती है, किंतु स्नेह और त्याग से पूरित यह माटी का दीप अंतस के तिमिर को हरता है।" व्यवसायी का सुसुप्त विवेक जाग उठा; उसे बोध हुआ कि वास्तविक सुख वैभव के प्रदर्शन में नहीं, मानवीय संवेदना में है। उसने सहर्ष समस्त दीपक क्रय कर कुटिया को आलोकित कर दिया। उस रात, चेतना का वह लघु दीप समूची धरा पर समरसता का आलोक बिखेर रहा था।