जगत का जंजाल - संसृति
मनुष्यों को अपने हृदय की सुबुद्धि से दीपशिखा जलानी चाहिए। उन्हें एक-दूसरे के मध्य भेदभाव डालकर मौज-मस्ती नहीं करनी चाहिए। मौज-मस्ती दो पल की भूल है, उनकी कुबुद्धि का फल शूल है। इस प्रकृति के ‘विशद-अंक’ में कलिकाल की संसृति का “श्रीगणेश” होता है; जहाँ सुख आने पर आनंद सुखित हो जाता है, वहीं दुख आने पर सुप्त-व्यथा जागृत होती है। उसी प्रकृति के विशद अंक में एक छोटा-सा गाँव है—दामनपुर, जो चारों ओर नदियों से घिरा हुआ है। कहीं–कहीं खुले मैदान हैं, तो किसानों का चाँद तोड़ने जैसा काम भी है। लोग अपनी–अपनी संस्कृति से जुड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। वहीं पथ के किनारे आम्र–पीपल के द्रुम लगे हुए हैं, जिससे शीतल समीर बह रही है और प्यारे अभिन्न निमग्न हो रहे हैं। वहाँ के अधिकांश ग्रामीण अल्पज्ञ हैं। वे किसी को ठेस लगाकर नहीं, अपितु खून-पसीना बहाकर अपनी जीविका चलाते हैं। वे अपने काम के आगे भगवान को स्मरण करना भूल जाते हैं; परेशानी सहन कर सकते हैं, किन्तु पराजित नहीं।" उसी गाँव में दानिक राम और भोजराम नामक दो भाई निवास करते हैं। वे दोनों भाई तो एक हैं, परंतु दोनों का स्वभाव एक जैसा नहीं है। पराई ची...