जगत का जंजाल - संसृति

मनुष्यों को अपने हृदय की सुबुद्धि से दीपशिखा जलानी चाहिए। उन्हें एक-दूसरे के मध्य भेदभाव डालकर मौज-मस्ती नहीं करनी चाहिए। मौज-मस्ती दो पल की भूल है, उनकी कुबुद्धि का फल शूल है।
इस प्रकृति के ‘विशद-अंक’ में कलिकाल की संसृति का “श्रीगणेश” होता है; जहाँ सुख आने पर आनंद सुखित हो जाता है, वहीं दुख आने पर सुप्त-व्यथा जागृत होती है। उसी प्रकृति के विशद अंक में एक छोटा-सा गाँव है—दामनपुर, जो चारों ओर नदियों से घिरा हुआ है। कहीं–कहीं खुले मैदान हैं, तो किसानों का चाँद तोड़ने जैसा काम भी है। लोग अपनी–अपनी संस्कृति से जुड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। वहीं पथ के किनारे आम्र–पीपल के द्रुम लगे हुए हैं, जिससे शीतल समीर बह रही है और प्यारे अभिन्न निमग्न हो रहे हैं। वहाँ के अधिकांश ग्रामीण अल्पज्ञ हैं। वे किसी को ठेस लगाकर नहीं, अपितु खून-पसीना बहाकर अपनी जीविका चलाते हैं। वे अपने काम के आगे भगवान को स्मरण करना भूल जाते हैं; परेशानी सहन कर सकते हैं, किन्तु पराजित नहीं।"
 उसी गाँव में दानिक राम और भोजराम नामक दो भाई निवास करते हैं। वे दोनों भाई तो एक हैं, परंतु दोनों का स्वभाव एक जैसा नहीं है। पराई चीज़ों पर आँखें गड़ाना बड़े भाई दानिक राम का पेशा है। लालच ने उन्हें अंधा बना दिया है, मानो कुबेर का धन पाकर भी उन्हें संतोष नहीं और बगैर संतोष के लालच का नाश कहाँ? हाँ, छोटे भाई भोजराम शील-स्वभाव के हैं। उन्हें दुनिया का लालच नहीं है, सिर्फ़ दो वक़्त की रोटी पर भरोसा है। वे लक्ष्मण के चरण-चिह्नों पर चलने वाले हैं। उनके भीतर बड़े भाई के प्रति सेवा व समर्पण के भाव हैं। तभी तो वे दानिक राम के हर उड़ते तीर को झेलते रहे, पर उन्हें क्या पता कि वे राम न होकर एक प्रपंची ठहरे...।""
     असल में, दानिक राम अपने आप को छोटे भाई भोजराम की अपेक्षा ज़्यादा समृद्ध और संपन्न समझते हैं, परंतु उससे भी ज़्यादा उनमें अहंकार है। वे नित्य रामायण का पाठ भी करते हैं, तब भी तुलसीदास जी के उस महान सिद्धांत को भूल ही जाते हैं जिसमें लिखा है—सत्य वचन बोलना चाहिए, सत्य कर्म और सत्य विचार से रहना चाहिए। हाँ, वे इस सिद्धांत को पढ़ते ज़रूर हैं, किंतु इसे अपनी हकीकत की दुनिया में नहीं उतार पाते। वे दुनिया के श्रेष्ठ ग्रंथों में से एक ‘श्रीरामचरितमानस’ में यह भी पढ़ते हैं कि 'भाई की भुजा भाई ही होता है।' फिर उसी भाई से वैमनस्यता किसलिए? तू-तू, मैं-मैं क्यों?""
   माना कि दानिक राम के पास वैभव-वस्तु विपुल है, पर प्रलय की अपेक्षा जीवन तो विथुर ही है न? फिर ऐसा अहंकार क्यों, मानो प्रलय के बाद भी जीवन का नाश नहीं होगा! दानिक राम के अहंकार-रूपी दीमक ने छोटे भाई के प्रेम-भाव-रूपी मखमल को चाट लिया है। वे यह समझ नहीं पा रहे हैं कि छोटे भाई भोजराम की झोपड़ी में अपनों का प्यार और दूसरों का आदर भी है। वे ग़रूर की आँखों से संसार को देखते हैं कि 'मेरे पास क्या नहीं है? सब कुछ तो है और उसके पास एक टूटी-फूटी झोपड़ी है, जिसमें खाने-पीने के लाले (तेरह-बाईस) पड़े हैं। वह तो भूख की मार से मारा-मारा फिरता है।' शायद बड़े भाई दानिक राम को संसार की वास्तविकता का ठीक-ठीक बोध नहीं है कि इस संसार में राजाओं का राज हो या धनवानों का धन, सब क्षणिक होता है। फिर गर्व किसलिए?"
"वे आधी खोपड़ी के जाहिल व्यक्ति हैं, जो साधारण सी ज़िंदगी को लेकर ऊँच-नीच के कार्य करते हैं। कभी किसी की जिल्लत करते हैं, तो कभी किसी पर इल्ज़ाम लगाते हैं; किन्तु जब इन कर्मों के परिणाम समीप आते हैं, तब वे चल नहीं पाते। जैसे-जैसे उनके जीवन की अंतिम घड़ियाँ आने लगती हैं, उनके जीवन का हर कर्म बोलने लगता है।दानिक राम के दो पुत्र हैं—कार्तिकेश्वर व अचिन्त कुमार। कार्तिकेश्वर एक शराबी है, जबकि अचिन्त कुमार सिविल कोर्ट, दामन पुर का मशहूर वकील है। उसकी नीति अलग ही है—‘वह सत्य का घोर विरोधी है।’ उसकी पत्नी अपाहिज है, जो पति के प्रपंचों के आगे परेशान रहती है, तब भी तन-मन-धन से पति के चरणों में प्रेम रखती है। वह एक धर्मपत्नी होने के नाते यह जानती है कि दान और तीर्थ से बढ़कर भी पति की सेवा है। एक दिन अनायास ही कार्तिकेश्वर शराब के नशे में मदमस्त होकर अपने काका भोजराम को मारने दौड़ा। अब भोजराम क्या करते? वे भागते-भागते पुलिस थाने जा पहुँचे। पुलिस आरक्षक ने देखते ही भोजराम को सलाम किया, क्योंकि वे गांधी टोपी और कुर्ता पहने हुए थे। तत्पश्चात, पुलिस ने कार्तिकेश्वर को दो हाथ लगाते हुए कारावास में डाल दिया, मानो दानिक राम के पहाड़ जैसे अहंकार को एक सबक मिल गया हो। लेकिन फूंक से पहाड़ कहाँ उड़ने वाला?"
"(कुछ दिनों बाद) जब वह जेलखाने से बाहर आया, तो पुनः वही बर्ताव करने लगा। आखिर कब तक? एक दिन दानिक राम की आँखों से ग़रूर का चश्मा उतर गया। अब उनके पास उस ग़रूर के चश्मे को पहनने के लिए आँखें ही नहीं रहीं, क्योंकि अचानक वकील अचिन्त कुमार इस दुनिया से चल बसा! उन्हें जिस धन-दौलत पर गर्व था, उसी धन-दौलत ने उनका साथ छोड़ दिया। फिर पैसा-पैसा किसलिए? क्या पैसों के बल पर यमराज ने वकील अचिन्त कुमार की जान बख़्शी? नहीं न! वे अपने बीते कल के कुकर्मों के कारण आने वाले कल को खो बैठे।
   जगत के जंजाल में आकर दानिक राम ने अपने पुत्र वकील अचिन्त कुमार को तो (मोह में) बाँध लिया था, किन्तु अपने अहंकार को नहीं बाँध पाए। इस जगत के ‘जंजाल’ में आकर अहंकार को नहीं, अपितु उस राम-नाम को भजना चाहिए, जिनका नाम ‘अनइच्छित हूँ अपवर्ग निसेही’ है। फिर अहंकार किसलिए? क्या केवल मायाजाल और मोहिनी में फँसने के लिए?प्रकृति के विशद अंक में कलिकाल की इस संसृति (भव, जन्म-मरण) का अंततः 'जय श्रीराम' हो जाता है।"

Comments

Post a Comment

Popular Posts