बाधाएँ और कठिनाइयाँ हमें रोकती नहीं, अपितु मज़बूत बनाती हैं।”लफ़्ज़ों से कैसे कहूँ कि मेरे जीवन की सोच क्या थी? आख़िर मैंने भी सोचा था कि पुलिस बनूँगा, डॉक्टर बनूँगा, किसी की सहायता करके ऊँचा नाम कमाऊँगा। पर नाम कमाने की बात तो दूर… ज़िंदगी ऐसे लड़खड़ा गई जैसे शीशे का टुकड़ा गिरकर भग्न हो गया हो। फ़र्क सिर्फ़ इतना सा रह गया जितना सजीव और निर्जीव में होता है। मैं क्यों निष्फल हुआ? हाँ, मैं जिस कार्य को करता था, उसमें सफल होने की आकांक्षा तो रखता था, परंतु मेहनत और लगन से जी चुराता था; इसलिए मेरी अकर्मण्यता के कारण सोच पर पानी फिर गया और सब गुड़-गोबर हो गया।अगर मैंने मेहनत और लगन से दिल लगाया होता, तो कोई भी मंज़िल पा सकता था, ऊँचा नाम कमा सकता था। अभी भी मेरे मन में कसक होती है, जब वे लम्हें याद आते हैं और दिल के टुकड़े-टुकड़े कर जाते हैं कि काश! मैं उस दौर में समय की महत्ता को जाना और समझा होता; जिस समय को मैंने यूँ ही खेल-कूद और मौज-मस्ती में अपव्यय कर दिया। बहरहाल, अब मैं गड़े मुर्दे उखाड़कर अपने दिल को ठेस नहीं पहुँचाऊँगा… वरन् उन दिलों में नव-नींव डालकर स्वर्णिम भविष्य का सृजन करूँगा।हाँ, मैं अल्पज्ञ हूँ, किंतु इतना साक्षर अवश्य हूँ कि अच्छे और बुरे व्यक्ति की पहचान कर सकूँ और उन दोनों का चरित्र-चित्रण समाज के सामने कर सकूँ। फिर यह कह सकूँ कि सत्यवान और कुटेव की सोच में ज़मीन और आसमान से भी अधिक अंतर होता है; चाहे क्यों न एक-दूजे का मिलन होता हो, वैचारिक मतभेद अपरिहार्य है। उन दोनों की ख़्वाहिशें अलग सी होती हैं, वे अपने ख़्वाबों में पृथक-पृथक इरादे लाते हैं—सु-कृत्य और दुष्कृत्य। सु-कृत्यों में जो स्थान किसी की सहायता करना, दिग्भ्रमितों को वापस सही राह पर लाना या यह कहें कि ऐसे सुकर्म हैं जिनका फल सुखद होता है; वहीं दुष्कृत्य करने वाले की सोच किसी की ज़िल्लत करना, किसी पर लांछन लगाने जैसे अशोभनीय और निंदनीय कर्मों में ही संलिप्त रहती है।सभी कर्मों का इतिहास ‘कर्म साक्षी’ है। फिर कैसे राजा लंकेश के कपट-कर्म और मन के कलुषित-भाव ने उसके साथ समूची लंका का पतन कर डाला! माना कि झूठ की आड़ से किसी की ज़िंदगी सलामत हो जाती है, तो उस वक्त के लिए झूठ बोलना सौ-सौ सत्य के समान है। परंतु निष्प्रयोजन मिथ्यात्व क्यों? फिर तो इस संसार में सत्य और सत्यवान की भी परीक्षा हुई है और सार्थक सोच की शक्ति ने अंततोगत्वा विजय पाई है। महापुरुष हों या साधारण व्यक्ति, सभी सांसारिक द्वंद्वों में मलिन होकर विषम परिस्थितियों में खोए रहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण ‘जीवन की सोच’ सत्कर्म में ही निहित होनी चाहिए।मैं यह तो नहीं कह सकता कि सिर्फ सोच रखने से ही आप सदा सफल हो जाएँगे; किन्तु यदि आप मेहनत, लगन और अटूट विश्वास के साथ डटे रहे, तो एक दिन चाँद-तारे भी तोड़ लाएँगे। कहीं आप भी ऐसा कार्य न कर बैठें कि बाद में आपको आठ-आठ आँसू रोना पड़े। आज मुझे बोध हुआ कि जीवन की सोच कैसी होनी चाहिए। मैं तो असफल हुआ; मरुस्थल में ओस चाटने से मेरी प्यास नहीं बुझी। लेकिन आप ज्ञानवान हैं, सोच-समझकर कार्य करें। आत्मविश्वास और मन की एकाग्रता से काम लें, नहीं तो आपको भी आठ-आठ आँसू रोने पड़ेंगे।— शिवराज आनंद
Sunday, January 26, 2014
जीवन की सोच
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शिवराज आनंद
व्यक्तिगत एवं शैक्षणिक पृष्ठभूमि उपनाम: शिवराज आनंद पूरा नाम: शिव कुमार साहू जन्म तिथि: 4 मई, 1987 जन्म स्थान: सोनपुर, तहसील रामानुजनगर,...
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Very good
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