Saturday, October 18, 2025

रावण का उद्घोष: "मैं तुममें शेष हूँ"

काष्ठ और तृण के ढाँचे को, तुमने पावक में झोंक दिया,
लपटों की भीषण ज्वाला ने, मेरा नश्वर तन सोख लिया।
तुम विजय-नाद का दंभ लिए, हँसते हो अपनी अज्ञानता पर,
पर ध्यान से देखो राख मेरी, मैं आज भी तुममें शेष हूँ।
जो दंभ तुम्हारे मानस में, जो लोभ तुम्हारे नयनों में,
मैं श्वास ले रहा हूँ अब तक, उन काम-क्रोध के स्पंदनों में।
तुम जिसे मरा समझ बैठे हो, वह मेरा अंतकाल नहीं,
हर कलुषित सोच के साए में, मैं युग-युग से तुममें शेष हूँ।
तुम प्रतिवर्ष जलाते हो मुझे, अपनी दुर्बलता छिपाने को,
एक झूठे आत्म-संतोष तले, अंतस की मलीनता दबाने को।
जब तक ईर्ष्या, छल और कपट, इस मानव-मन का हिस्सा है,
तब तक यह रावण मरा नहीं, मैं जीवित ही तुममें शेष हूँ।
मत करो ढोंग इस विजय का, तुम पराजित हो अपने मन से,
मैं अमर तत्व बन व्याप रहा, इस कलयुग के कण-कण में।
जब तक न मिटेगी पाशविकता, तब तक मेरा अवसान नहीं,
पहचानो अपने भीतर मुझे, मैं तुममें शेष हूँ।
 

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