Saturday, July 25, 2026
Saturday, October 18, 2025
रावण का उद्घोष: "मैं तुममें शेष हूँ"
काष्ठ और तृण के ढाँचे को, तुमने पावक में झोंक दिया,
लपटों की भीषण ज्वाला ने, मेरा नश्वर तन सोख लिया।
तुम विजय-नाद का दंभ लिए, हँसते हो अपनी अज्ञानता पर,
पर ध्यान से देखो राख मेरी, मैं आज भी तुममें शेष हूँ।
लपटों की भीषण ज्वाला ने, मेरा नश्वर तन सोख लिया।
तुम विजय-नाद का दंभ लिए, हँसते हो अपनी अज्ञानता पर,
पर ध्यान से देखो राख मेरी, मैं आज भी तुममें शेष हूँ।
जो दंभ तुम्हारे मानस में, जो लोभ तुम्हारे नयनों में,
मैं श्वास ले रहा हूँ अब तक, उन काम-क्रोध के स्पंदनों में।
तुम जिसे मरा समझ बैठे हो, वह मेरा अंतकाल नहीं,
हर कलुषित सोच के साए में, मैं युग-युग से तुममें शेष हूँ।
मैं श्वास ले रहा हूँ अब तक, उन काम-क्रोध के स्पंदनों में।
तुम जिसे मरा समझ बैठे हो, वह मेरा अंतकाल नहीं,
हर कलुषित सोच के साए में, मैं युग-युग से तुममें शेष हूँ।
तुम प्रतिवर्ष जलाते हो मुझे, अपनी दुर्बलता छिपाने को,
एक झूठे आत्म-संतोष तले, अंतस की मलीनता दबाने को।
जब तक ईर्ष्या, छल और कपट, इस मानव-मन का हिस्सा है,
तब तक यह रावण मरा नहीं, मैं जीवित ही तुममें शेष हूँ।
एक झूठे आत्म-संतोष तले, अंतस की मलीनता दबाने को।
जब तक ईर्ष्या, छल और कपट, इस मानव-मन का हिस्सा है,
तब तक यह रावण मरा नहीं, मैं जीवित ही तुममें शेष हूँ।
मत करो ढोंग इस विजय का, तुम पराजित हो अपने मन से,
मैं अमर तत्व बन व्याप रहा, इस कलयुग के कण-कण में।
जब तक न मिटेगी पाशविकता, तब तक मेरा अवसान नहीं,
पहचानो अपने भीतर मुझे, मैं तुममें शेष हूँ।
मैं अमर तत्व बन व्याप रहा, इस कलयुग के कण-कण में।
जब तक न मिटेगी पाशविकता, तब तक मेरा अवसान नहीं,
पहचानो अपने भीतर मुझे, मैं तुममें शेष हूँ।
Tuesday, September 5, 2023
पर - कल्याण
क्षुधित कंठ, व्याकुल नयन, विप्रदा की है मार,
अकिंचनता के तिमिर में, सिसक रहा संसार।
सूनी छत और टूटा आँगन, सहते ठंडा घाम,
ग़रीबों का इस दुनिया में, कोई न लेता नाम।
पर-हित में जो जी सके, वही मनुज गतिमान,
सच्ची मानवता यही, जीवें पर-कल्याण।
औरों के हित जीना सीखो, छोड़ो स्वार्थ अपार,
दीन-हीन के कष्ट का, जो बन सके आधार।
सूनी छत और टूटा आँगन, सहते ठंडा घाम,
ग़रीबों का इस दुनिया में, कोई न लेता नाम।
पर-हित में जो जी सके, वही मनुज गतिमान,
सच्ची मानवता यही, जीवें पर-कल्याण।
औरों के हित जीना सीखो, छोड़ो स्वार्थ अपार,
दीन-हीन के कष्ट का, जो बन सके आधार।
Friday, November 18, 2022
प्राकृतिक का शाश्वत स्वर
क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर का यह पुतला है,
मानव का जीवन प्रकृति का रूप रूपहला है।
हृदय-विस्तार यहाँ अंबर की सुंदर भाँति है,
चंचल भावनाएँ मानो ऋतुओं की परिपाटी हैं।
मानव का जीवन प्रकृति का रूप रूपहला है।
हृदय-विस्तार यहाँ अंबर की सुंदर भाँति है,
चंचल भावनाएँ मानो ऋतुओं की परिपाटी हैं।
तरल अभिलाषाएँ नदियाँ बन-बनकर बहती हैं,धैर्य-परिभाषाएँ अडिग शैल सी रहती हैं।
उर की तीव्र ज्वाला मुखरित दावानल बन जाती है,
ओस-कण सी करुणा जग को पावन कर जाती है।
ओस-कण सी करुणा जग को पावन कर जाती है।
प्राणों का स्पंदन मारुत की शीतल गति है,
काया की यह हलचल धरती की अंगड़ाई है।
मन की नीरवता नभ जैसी शांत और गहरी है,
आँखों की नीली आभा सागर सी ठहरी है।
काया की यह हलचल धरती की अंगड़ाई है।
मन की नीरवता नभ जैसी शांत और गहरी है,
आँखों की नीली आभा सागर सी ठहरी है।
मुख पर छाई रौनक कली नई सी लाई है,
साँसों में मलयज की मंद सुगंधि समाई है।
विचारों की ये लहरें प्रकृति की ही संधि हैं,
वाणी की गूँज मधुर पंछी सी आनंदी है।
साँसों में मलयज की मंद सुगंधि समाई है।
विचारों की ये लहरें प्रकृति की ही संधि हैं,
वाणी की गूँज मधुर पंछी सी आनंदी है।
मस्तक की भव्य ऊँचाई पर्वत का ही मान है,
सुख-दुख के दो तट जीवन-सरिता की शान हैं।
सृजन और संहार यहाँ ऋतु चक्र की संपति है,
माटी से जन्मी काया माटी की ही अमानत है।
सुख-दुख के दो तट जीवन-सरिता की शान हैं।
सृजन और संहार यहाँ ऋतु चक्र की संपति है,
माटी से जन्मी काया माटी की ही अमानत है।
पल-पल बदलता यह रूप प्रकृति का शाश्वत स्वर है,
पंचतत्व की यह देह, पंचतत्व में विलीन होना ही इसका नियम अमर है।
पंचतत्व की यह देह, पंचतत्व में विलीन होना ही इसका नियम अमर है।
Sunday, October 4, 2020
गौरव सूरजपुर का
गौरव सूरजपुर का
विंध्य की गोद में सोई, अनुपम छटा निराली है,
महानदी की निर्मल धारा, लाती यहाँ खुशहाली है।
दण्डबुल्ला और सूर्यपुर था, जिसका वैभवशाली इतिहास,
सूरजपुर की पावन माटी, रचती नित नया विश्वास।
सरगुजा के अंचल से जन्मा, यह अनुपम भू-भाग प्रिय,
सूरजपुर की पावन माटी, सबको लगती बेहद प्रिय।
कुदरगढ़ की ऊँची चोटी पर, है माँ बागेश्वरी का धाम,
श्रद्धा से झुकता मस्तक है, मिलता पल में मन को विश्राम।
रकसगंडा के जलप्रपात में, झर-झर झरता राग नया,
तमोर पिंगला के जंगल में, पत्थरों का है बाग नया।
साल और सागौन के वृक्ष यहाँ, जो झूम रहे हैं चारों ओर,
इस पावन हरियाली अंचल में, नाच रहे हैं वन में मोर।
गोंड़, पण्डो और चेरवा की, यह सुंदर अद्भुत थाती है,
करमा, सुआ और सैला धुन पर, उमंग जगाती यह माटी है।
सरल हृदय और सहज भाव है, यहाँ के सीधे लोगों में,
अमृत-रस घुला हुआ सा है, यहाँ के मीठे बोलों में।
खेतों की सोंधी खुशबू में, यहाँ श्रम की सच्ची कहानी है,
महानदी और रेण की लहरों में, बहता कल-कल पावन पानी है।
सुदूर दक्षिण के आँचल में पावन, शिवपुर की सुन्दर गुफा महान,
प्राकृतिक जल से अभिषिक्त, विराजमान हैं भोले भगवान।
कुम्दा-गुरमाता की पावन महिमा, साऊब का अद्भुत कोना,
कण-कण में मर्यादा बसती है, राम नाम का सुंदर गहना।
पूर्व दिशा के पावन पथ पर, वैभव का उजियारा है,
देवीपुर में माँ महामाया ने, अपना रूप सँवारा है।
पश्चिम में सरसोर की महिमा, गंगा जैसी पावन धार,
लहरें छूकर पावन करतीं, भोले का नित ही श्रृंगार।
इस तपोभूमि में ऋषि-मुनियों की, भक्ति का बहता मधुमास,
पश्चिम की यह पावन माटी, लाती जीवन में उल्लास।
सूरजपुर घाटी का, कण-कण एक अनमोल रत्न,
शत-शत नमन है तुझको सुंदर, जय-जय छत्तीसगढ़ के चमन!
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