Monday, March 9, 2020
Wednesday, January 29, 2020
बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं
हे वरदायिनी मुझे वर दे मैं नित्य आपका उपासक बन आप की सेवा करना रहूं। बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं जय सरस्वती..
Tuesday, December 31, 2019
Thursday, October 24, 2019
माता विसर्जन
विसर्जनोपरांत सरिता, नीरद निस्तब्ध है खड़ा,
पवन का प्रवेग देखो, मंद-मंथर है पड़ा।
पवन का प्रवेग देखो, मंद-मंथर है पड़ा।
धान्य-क्षेत्र की हैं बालियाँ, अवनत शीश झुका रहीं,
तज कलरव विहंगम-वृन्द, मौन गुंजन गा रहीं।
तज कलरव विहंगम-वृन्द, मौन गुंजन गा रहीं।
नभ में मेघमाला आज, अश्रुपूरित भारी हुई,
धरणी की धरा उर्वरा, विकल सी उजाड़ी हुई।
धरणी की धरा उर्वरा, विकल सी उजाड़ी हुई।
कम्पित है दीप-शिखा, तुलसी-चौरा विषाद-युक्त है,
अंतःकरण विलाप-रत, नयन अश्रु-सिक्त है।
अंतःकरण विलाप-रत, नयन अश्रु-सिक्त है।
प्रतिमा-विसर्जन यह नहीं, पंचतत्व में विलय है,
माँ अंतर्धान कहाँ हुई? कण-कण अक्षय लय है।
माँ अंतर्धान कहाँ हुई? कण-कण अक्षय लय है।
Saturday, October 12, 2019
Wednesday, November 15, 2017
मानवता की 'डगर' पर
मानवता की डगर पर
हे प्रिय! तुम मुझे अपना लो,
गुमराह हूँ, राह दिखा दो।
यूँ न छोड़ो अभिमन्यु-सा,
मानवता पथ पर बढ़ा लो।
गुमराह हूँ, राह दिखा दो।
यूँ न छोड़ो अभिमन्यु-सा,
मानवता पथ पर बढ़ा लो।
वहाँ महान सत्यवादी हैं,
सत्य-अहिंसा के पुजारी हैं;
वे रावण का पाप मिटाते हैं,
मचे हाहाकार सिमटाते हैं।
सत्य-अहिंसा के पुजारी हैं;
वे रावण का पाप मिटाते हैं,
मचे हाहाकार सिमटाते हैं।
इस पावन पथ पर ज़ंजीर नहीं,
जो बाँध पैर को जकड़ सके;
रास्तों में ऐसा विघ्न नहीं,
जो रोक मार्ग को अकड़ सके।
जो बाँध पैर को जकड़ सके;
रास्तों में ऐसा विघ्न नहीं,
जो रोक मार्ग को अकड़ सके।
है मानवता की डगर निराली,
जीत ले प्रेम से, वही खिलाड़ी।
यहाँ न मज़हब, न भेदभाव है,
सबके दिलों में बस समभाव है।
जीत ले प्रेम से, वही खिलाड़ी।
यहाँ न मज़हब, न भेदभाव है,
सबके दिलों में बस समभाव है।
परहित में वे हँस ज़हर पीते हैं,
औरों की खातिर ही जीते हैं;
स्वर्ग-नर्क सब यहीं बना है,
मानव सोच का फ़र्क़ घना है।
औरों की खातिर ही जीते हैं;
स्वर्ग-नर्क सब यहीं बना है,
मानव सोच का फ़र्क़ घना है।
इस राह से हम विमुख न हों,
हालात चाहे जो, हताश न हों;
मन में सदा आस-विश्वास रहे,
जीवन में कभी निराश न हों।
हालात चाहे जो, हताश न हों;
मन में सदा आस-विश्वास रहे,
जीवन में कभी निराश न हों।
आओ, नई जीवन-ज्योति जला दें,
सुख-शांति का यह नगर सजा दें;
कण-कण में बसते राम यहाँ हैं,
भारत-भारती के जन को बता दें।
सुख-शांति का यह नगर सजा दें;
कण-कण में बसते राम यहाँ हैं,
भारत-भारती के जन को बता दें।
Tuesday, January 17, 2017
उठो युवा,तुम उठो ऐसे. . .
उठो युवा तुम उठो ऐसे
उठो युवा तुम उठो ऐसे
चक्रवात में तूफ़ाँ उठता है जैसे
हाँ, अब कौन युवा तुम्हारे सिवा?
रक्षक प्यारे देश के
तुम चाहते तो तांडव मचे
देर है तुम्हारे उस वेश की
अब तो सब से आशा भी टूटी
लगती है अब दुनिया भी झूठी
कैसी माँ? कि कैसा लाल?
जो जनकर भी जने क्या लाल?
जो देश की गरिमा बचा सके
ध्वंस कर रावण-राज धरा से
एक आदर्श रामराज्य बना सके
तुम देश की आन-बान हो
हिंदू हो या मुसलमान हो
किसी मज़हब के नहीं, तुम मातृभूमि के लाल हो
तुम काल के भी महाकाल हो
फिर क्यों अंजान हो?
क्या नेताओं से परेशान हो?
ओह! कहीं विलीन न हो मेरे सपनों का भारत!
हे महारथी! तुममें है सामर्थ्य
रोक दो यह अनर्थ
अगर है मोहब्बत, तो अपनी यौवन शक्ति जगा दो।
आज अपने युग का अत्याचार मिटा दो।
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सद्भाव का सबेरा
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