मानवता की 'डगर' पर
प्यारे! प्यारे! तुम मुझे भी अपना लो,
गुमराह हूँ, कोई राह दिखा दो।
यूँ न छोड़ो एकाकी अभिमन्यु सा रण पर
मुझे भी साथ ले चलो मानवता की डगर पर॥
गुमराह हूँ, कोई राह दिखा दो।
यूँ न छोड़ो एकाकी अभिमन्यु सा रण पर
मुझे भी साथ ले चलो मानवता की डगर पर॥
वहाँ बड़े सत्यवादी हैं,
सत्य-अहिंसा के पुजारी हैं।
वे रावण के अत्याचार को मिटा देते हैं,
हो गर हाहाकार, तो सिमटा देते हैं॥
वे रावण के अत्याचार को मिटा देते हैं,
हो गर हाहाकार, तो सिमटा देते हैं॥
इस पथ में कोई ज़ंजीर नहीं,
जो बाँधकर जकड़ सके।
पथ में कोई विघ्न नहीं,
जो रोककर अकड़ सके।।
है यह मानवता की डगर निराली,
जीत ले जो प्रेम, वही खिलाड़ी।
यहाँ मज़हब न भेदभाव,
सर्वधर्म समभाव से जीते हैं,
वक़्त आए तो हँस के ज़हर पीते हैं॥
जीत ले जो प्रेम, वही खिलाड़ी।
यहाँ मज़हब न भेदभाव,
सर्वधर्म समभाव से जीते हैं,
वक़्त आए तो हँस के ज़हर पीते हैं॥
फिर तो स्वर्ग यहीं है, नर्क यहीं है,
मानव मानव ही है, बस सोच का फ़र्क़ है।
ओ प्यारे! इस राह से हम न हों किनारे,
न हताश हों, न निराश हों,
मन में आस व विश्वास हो॥
फिर आओ जग में जीकर,
जीवन-ज्योत जला दें।
सुख-शांति के नगर को,
स्वर्ग सा सजा दें।
आज भी राम हैं कण-कण में,
भारत-भारती के जन-जन को बता दें॥
जीवन-ज्योत जला दें।
सुख-शांति के नगर को,
स्वर्ग सा सजा दें।
आज भी राम हैं कण-कण में,
भारत-भारती के जन-जन को बता दें॥
(तुकान्त मुक्त छंद)
बहुत खूब
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