मेरे मुख-मंडल पर सिर्फ एक ही बात का संशय बना रहता है। मैं दिनों-दिन हो रहे दंगा-फसाद, चोरी-डकैती जैसे विषयों पर उलझा रहता हूँ। आखिर ऐसी लूटपाट कब तक चलेगी? ऐसे में क्या हम अपनी मंजिल तक पहुँचने में कामयाब हो पाएंगे? हम मानते हैं कि प्रत्येक प्राणी प्रकृति से जकड़ा है, तब भी उन्हें अपना जीवन जीने में झंझट क्यों है? क्योंकि हम सबको यह भय है कि हमारे साँसों की डोरियाँ कब टूट जाएँगी।"मैं देश के हित में जान गंवा दूँ, चेहरे पर काली पट्टी बाँधकर नाम बदल दूँ, किंतु अपनी आवाज़ को नहीं बदल सकता..." 'यह मेरी आवाज़' देश व समाज में सुरीति लाना चाहती है, एक नया परिवर्तन लाना चाहती है, जिससे देश व समाज की संस्कृति कायम रह सके। स्वदेश को एक अखंड देश बनाने के साथ ही हम हिमालय के सदृश देश का गौरव ऊँचा कर सकें।मेरे मन की आवाज़ के साथ उन गरीबों की भी आवाज़ जुड़ी है, जो सामने कहने से कतराते हैं, कह नहीं सकते... पर मेरा मन ऐसा ही कहता है। यह आवाज़ आपकी हमसाया बनकर, देश की पहचान बनकर शाश्वत (अमर) रहेगी।ऐसे स्वदेश का नवनिर्माण करना आकाश-कुसुम (असंभव) नहीं है, यदि प्रथम गुरु (माता-पिता) अपने बच्चों को अच्छी सीख दें। मैं कब तक देश की दयनीय दशा देखकर इन आँखों से आँसू बहाऊँगा? मैं कब तक देश व समाज के बोझ को कंधों का सहारा दूँगा? आखिर कब तक? जब तक मेरी साँसों की डोरियाँ चलेंगी और ये आँखें दुनिया देखेंगी, तब तक बस न! फिर आगे...? आखिर उन्हें किसी की जिंदगी के साथ मौत का खेल खेलने में क्या मिलता है? बस देश व समाज की तौहीन... और क्या? ऐसे ही भाव मन में लाकर मैं खोया रहता हूँ। मुझे नींद नहीं आती... क्या हमारा जीवन इन कर्मों से महान होगा, यदि हमारे मन, वचन और आचरण पवित्र न हों?हमें अपना आचरण बदलना होगा और ऐसे आचरण रूपी ढाल को अपनाना होगा, जिससे देश व समाज की संस्कृति की रक्षा हो सके। अंततः मेरी आशा है कि एक दिन मेरे "मन की आवाज़" उनके मस्तिष्क में घड़ी की सुई सी अवश्य घूमेगी। तब उनका हृदय भावुक होगा। एक दिन उनके भी 'दिन फिरेंगे', तो वे भविष्य का सृजन करेंगे। एक दिन ज़रूर ममत्व जागृत होगा, तब मैं अपने दिल की नगरी में कह सकूँगा– “ईश्वर की कृपा से सब कुशल है”।
Monday, March 9, 2015
जियो उनके लिए
जियो उनके लिएमेरे जीने की आस ज़िंदगी से कोसों दूर चली गई थी कि अब मेरा कौन है? मैं किसके लिए अपना आंचल पसारूँगा? पर देखा—लोक-लोचन में असीम वेदना। तब मेरा हृदय मर्मांतक हो गया, फिर मुझे ख्याल आया कि अब मुझे जीना होगा, हाँ, अपने स्वार्थ के लिए न सही, परमार्थ के लिए ही।मैं ज़माने का निकृष्ट था, तब देखा उस सूर्य को कि वह निःस्वार्थ भाव से कालिमा में लालिमा फैला रहा है, तो क्यों न मैं भी उसके सदृश बनूँ। भला-मानुष बन सुप्त मनुष्यत्व को जाग्रत करूँ। मैंने शनैः-शनैः सद्मानुष की आँखों से देखा—लोग असह्य दर्द से विकल हैं, उन पर ग़म व दर्दों का पहाड़ टूट पड़ा है और चक्षु-जल ही जलधि बन पड़ा है। फिर तो मैं एक पल के लिए विस्मित हो गया। मेरा कलेजा मुँह को आने लगा। परन्तु दूसरे क्षण वही कलेजा ठंडा होता गया और मैंने चक्षु-जल से बने जलधि को रोक दिया; क्योंकि तब तक मैं भी दुनिया का एक अंश बन गया था।किन्तु अब मेरी सांसें लड़खड़ाने लगी हैं, जो मैंने उठाया था ग़म व दर्दों के पहाड़ से भार, वह पुनः गिरने लगा है। अतः हे भाई! अब मैं उनके लिए तुम्हारे पास, आस लेकर आँचल पसारता हूँ... और कहता हूँ तुम उन अंधों की आँख बन जाओ, तुम उन लंगड़ों के पैर बन जाओ और जियो 'उनके लिए'। क्या तुम उनके लिए जी सकोगे? या तुम भी उन जन्मांधों के सदृश काम (वासना) में अंधे बने रहोगे?राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही कहा है–
'जीना तो है उसी का,
जिसने यह राज़ जाना है।
है काम आदमी का,
औरों के काम आना है।।'
यहाँ उनका भी 'दिल' जोड़ दो
यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो,
जिनके दिल टूटे हैं, चलते कदम थमे हैं,
वे न जीना जानते हैं,
न ज़ख़्मों को सीना जानते हैं।
प्यारे, तुम उन्हें भी अपना लो ।
मेरी बात मान, विश्व-बंधुत्व का भाव लेकर, जन-जन से बैर-भाव छोड़ दो।
"यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो"।।
वे न जीना जानते हैं,
न ज़ख़्मों को सीना जानते हैं।
प्यारे, तुम उन्हें भी अपना लो ।
मेरी बात मान, विश्व-बंधुत्व का भाव लेकर, जन-जन से बैर-भाव छोड़ दो।
"यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो"।।
हम सबके ओ प्यारे, किस कदर हैं दूर किनारे?
जीत की भी आस रखते हैं वे मन मारे।
ये मन मैले नहीं, निर्मल हैं;
सबल न सही, निर्बल हैं।
समझते हैं हम जिन्हें पीछे हैं,
वे कदम-दो कदम ही पीछे हैं,
जो हिला दे उन्हें, ऐसी आँधी का रुख मोड़ दो।
यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो।।
समझते हैं हम जिन्हें पीछे हैं,
वे कदम-दो कदम ही पीछे हैं,
जो हिला दे उन्हें, ऐसी आँधी का रुख मोड़ दो।
यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो।।
दिल बिना क्या यह महफ़िल है?
क्या जीने के सपने हैं?
बेगाना कोई नहीं, सब अपने हैं।
क्या जीने के सपने हैं?
बेगाना कोई नहीं, सब अपने हैं।
ये सब मन के अनुभव हैं;
नहीं हूँ अभी वह, पहले मैं था जो।
सुना था मैंने मरना ही दुखद है,
पर देखा लालसाओं के साथ जीना,
महादुखद है।
नहीं हूँ अभी वह, पहले मैं था जो।
सुना था मैंने मरना ही दुखद है,
पर देखा लालसाओं के साथ जीना,
महादुखद है।
फिर क्या है सुख?
क्या जीवन का सार?
सुख है सबके हितार्थ में,
जीवन का सार है अपनत्व में—
ऐसा अपनत्व जो एक-दूजे का दिल जोड़ दे,
कोई गुमनाम न हो, नाम जोड़ दे।
वरना सब असार है चोला,
सब राम-रोला भाई, सब राम-रोला।।
यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो - शिवराज आनंद
क्या जीवन का सार?
सुख है सबके हितार्थ में,
जीवन का सार है अपनत्व में—
ऐसा अपनत्व जो एक-दूजे का दिल जोड़ दे,
कोई गुमनाम न हो, नाम जोड़ दे।
वरना सब असार है चोला,
सब राम-रोला भाई, सब राम-रोला।।
यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो - शिवराज आनंद
Sunday, October 26, 2014
प्रेम - जगत १
प्रेम-जगत १
( 'प्रेम-जगत' संसार का रंगमंच है और हम सभी इस रंगमंच के पात्र हैं।)
विज्ञों का ऐसा मत है कि प्रेम की आग की उष्णता से सृष्टि की रचना हुई है। मनु और शतरूपा ने भाव-संवेदन से धड़कती 'प्रेम-भावना' के लिए, स्वर्ग के संवेदन-हित 'आनंद-रस' को नहीं, अपितु जगत के कठोर जीवन को अपनाया। 'ढोला-मारू, लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट और हीर-रांझा' की प्रेम-कथाएं तो यही रेखांकित करती हैं कि प्रेम ही जीवन का सार है, और प्रेम-विहीन जगत वीरान है। इसी प्रेम के वशीभूत होकर जगत बनाने वाले माता (प्रकृति) व पिता (पुरुष) ने जगत का निर्माण किया। अतः, उन्हें मेरा सहस्रों बार प्रणाम!
( 'प्रेम-जगत' संसार का रंगमंच है और हम सभी इस रंगमंच के पात्र हैं।)
विज्ञों का ऐसा मत है कि प्रेम की आग की उष्णता से सृष्टि की रचना हुई है। मनु और शतरूपा ने भाव-संवेदन से धड़कती 'प्रेम-भावना' के लिए, स्वर्ग के संवेदन-हित 'आनंद-रस' को नहीं, अपितु जगत के कठोर जीवन को अपनाया। 'ढोला-मारू, लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट और हीर-रांझा' की प्रेम-कथाएं तो यही रेखांकित करती हैं कि प्रेम ही जीवन का सार है, और प्रेम-विहीन जगत वीरान है। इसी प्रेम के वशीभूत होकर जगत बनाने वाले माता (प्रकृति) व पिता (पुरुष) ने जगत का निर्माण किया। अतः, उन्हें मेरा सहस्रों बार प्रणाम!
पारिवारिक सुख आकाश में घटाओं के सदृश होता है। सुख उत्पन्न तो होता है, पर चिरकाल तक स्थिर नहीं रहता; वह उन घटाओं के सदृश ही छिप जाता है।
"वर्षों से मेरे आँगन में एक 'अंगना' (स्त्री) नहीं है, जिससे मेरा आँगन सूना है।" ऐसा ही विचार करके 'मनीलाल' अपने पुत्र (मधुसूदन) का विवाह कर रहे हैं। असल बात यह है कि मधुसूदन जब दस वर्ष का था, तब उसकी 'जन्म-जननी' दुनिया से चल बसी थीं। वह माँ की ममता को न पा सका; माँ की ममता उसके लिए आसमान के कुसुम जैसी हो गई।'मनीलाल' मंजोलगढ़ के एक ईमानदार पुरुष हैं। वे सबको 'एक आँख' से देखते हैं। पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी आँखों में खून उतर आता था; बस याद आती, तो कमर टूट जाती थी। बस उसी याद को भुलाने और दुःख के आँसुओं को सुख में बदलने के लिए ही वे अपने पुत्र का विवाह कर रहे हैं।मधुसूदन का विवाह सुमन के साथ हो रहा है। 'सुमन' एक सजीली लड़की है। वह विदित नारायण की पुत्री है। 'विदित नारायण' भले व नेक इंसान हैं। वे 'प्रेमगढ़' के कुशल व्यक्ति हैं। आखिरकार एक दिन मधुसूदन की बारात प्रेमगढ़ के लिए निकल पड़ती है और लोगों के इंतजार की घड़ियाँ खत्म हो जाती हैं।
'प्रेमगढ़' एक मनभावन नगर है। , किन्तु 'मधुसूदन' की बारात ने उस नगर की ओर सजा दिया है उस जन -संकुल नगर में अति चहल - पहल है । मधुसूदन के माथे पर सुन्दर सेहरा है । जिससे मधुसूदन अति प्रसन्नचित है । वहां का विशद् ए नूर अनुपम है । धरती से आसमा तक शहनाइयों की ध्वनि गूंज रही है , तारे - गण आकाश में टिमटिमा रहे हैं मानों सबके खुशीयों में झूम रहे हों । (कुछ देर बाद) पुरोहितों द्वारा शिव ,गौरी व गणेश जी की पूजा कराइ जा रही है। वहीं सुहागिन स्त्रियों मंगल गान गा रहीं हैं । जिससे आये सभी कुटुम्ब जन आनंदित हो रहे हैं। (धीरे- धीरे द्वार चार की रीति- रस्म पूर्ण हो जाती हैं) वही एक सुंदर जनवास है जिसमे आये सभी बारातियों की मंडली क्रमशः बैठी है। उन सबकी नज़र (सामने) दूल्हे और दुल्हन पर एक टक लगी हैं । 'वे' सब उनके मुस्कान भरे चेहरे को देखकर बरबस ही मोहित हो रहें हैं। ख़ैर सुंदरता किसे नही मोहित कर लेती ।
आज'सुमन' बारहों आभूषणों से सजी है। उसके पैरों में नूपुर के साथ किंकिणी है। उसके हाथों में कंगन के साथ चूड़ियाँ हैं। उसके गले में कंठश्री है। बाहों में बसेर-बिरिया के साथ बाजूबंद है। माथे पर सुंदर टीके के साथ शीश पर शीशफूल है। उसे देखकर ऐसा लग रहा है, मानो 'सुमन' नंदनवन की परी हो, जहाँ शृंगार-रस और सौंदर्य का मिलन हुआ हो।अब प्रभात की सुमधुर बेला में 'सुमन' और 'मधुसूदन' सात फेरों के पवित्र बंधन में बंध रहे हैं। उनके इस बंधन के साक्षी अग्निदेव हैं। वहीं, अपने कुल के अनुसार लाई-परछन और नेक-चार की रीतियाँ-रस्में पूर्ण हो रही हैं। हालांकि 'सुमन' का अपना कोई भाई नहीं है, फिर भी 'मंगला' नाम का व्यक्ति इसे अपना सौभाग्य मानकर अपने हाथों से सुंदर संबंध निभा रहा है; मानो सीता जी के लिए पृथ्वी के पुत्र मंगल ग्रह स्वयं आए हों।शनैः-शनैः विदाई की पुनीत घड़ी आन पड़ी है, जहाँ पूजनीय पिता 'विदित नारायण' के पाँव नहीं उठ रहे हैं और वे टस से मस नहीं हो पा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, माँ 'सुनैना' की ममता टूटकर बिखरी पड़ी है।'प्रेम-जगत' का प्रेम ही अजूबा है। जब 'सुमन' अपने पति के गले में वरमाला डाल रही थी, तब सबकी आँखें एकटक होकर उसकी ओर देख रही थीं। परंतु, अब सबकी आँखें नम हैं। किसी के मुख से कोई शब्द बोलते नहीं बन रहा है, मानो सौंदर्य ने शृंगार-रस छोड़कर शांत-रस को अपना लिया हो। जो 'सुमन' कल तक अपनी सखी-सहेलियों की प्रिया थी, अपने बाबुल की गुड़िया थी और बाबुल की प्रीत रूपी बाहों में झूलकर कली से सुमन बनी थी... आज वही सुमन बाबुल की प्रीत में मुरझाकर विदा हो रही है। खैर, बगैर मुरझाए सुमन को बहारों का सुख कहाँ मिलेगा? जब तक इस जगत में प्रेम रहेगा... तब तक सुमन को बहारों का सुख मिलता रहेगा।चंद लम्हों के बाद विदित नारायण अपने दिल के टुकड़े को विदा कर देते हैं। 'सुमन' आँखों ही आँखों में देखते-देखते प्रेमांगन से दूर चली जाती है।
प्रेम -जगत २
'मनीलाल' कृत- कृत्य हो गए , जो उनके वर्षो की सुनी आंगन में' सुमन 'का जो आगमन हुआ । इस जगत में प्रेम भी अपने वेष को बदलता रहता है । जो 'मनीलाल' कल तक लोगों की सलामती की कामना करते थे, वही 'मनीलाल' अनायास ही परलोक सिधार गए। सारा सुख, दुःख में बदल गया। जहाँ मधुसूदन की जिंदगी चाँदनी रातों के समान दमक रही थी, अब वहाँ खौफनाक अंधेरा छा गया है—सिर्फ अंधेरा… अब तो मधुसूदन पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा है। "अगर उसके मन में प्रसन्नता होती, तो रात का घना अंधेरा भी दीप्त हो उठता"; किन्तु यदि चाँदनी रातों पर ही दुःखों का साया पड़ जाए, तो उसे भला कौन रोशन करेगा?वहाँ मधुसूदन बिलख-बिलखकर रो रहा है। शोक की इस बेला में वहाँ एकत्र हुए सभी सज्जन विमन हैं। उन्हें मधुसूदन का यह कारुणिक विलाप अच्छा नहीं लगता वे कह उठते हैं -"मत रो मधुसूदन! जो होनहारी है,वह तो होगा ही।इस संसार में संयोग से मिलन होता है और वियोग से बिछड़ना। हाँ मधुसूदन यह जिन्दगी केवल रुदन के लिए नहीं है;जीवन का प्रवाह जैसा बहता है,तू बहने दे। किन्तु तू मत रो, रोना जगत के लिए पाप है।मृत्यु ही इस नश्वर संसार का अंतिम और शाश्वत सत्य है। यह रोने की घड़ी नहीं है। बाल्यकाल में जिन कंधो को हांथी, घोड़ा और पालकी बनाकर अपार आनंद उठाया था,आज उन्हीं कंधो का ऋण (मोल) अदा करना है। इसलिए तुम अपने पिता(मनीलाल )को कंधा दो।"
मनीलाल केसिधारते ही घर की आर्थिक स्थिति दुरुस्त नहीं रही। जहाँ मधुसूदन ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहा था... अब वहीं वह पहाड़ खोद-खोदकर चुहिया निकालने लगा, जिससे प्रेम-जाल में बँधी पत्नी (सुमन) और पुत्र का पेट पल सके।आखिरकार एक दिन मधुसूदन घर की स्थिति को दुरुस्त करने के लिए घर से निकल गया, बहुत दूर... वह अपने जान से प्यारे पुत्र को ममत्व की छाँव में छोड़ गया, जहाँ माँ (सुमन) की ममता अपार थी और पुनीत गोद विशाल।ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है। जब मधुसूदन दो वर्ष तक घर नहीं आया, तब 'सुमन' नयन-जल लिए विलापने लगी— "ओह देव! क्या मेरे पतिदेव जगत में कुशल भी हैं या आपने उनसे मेरा नाता तोड़ दिया?" वह एक तरफ स्तम्भित होकर भगवान को दोष देती, तो वहीं दूसरी तरफ अनुसूया जैसी पतिव्रता नारी के धर्म का पालन भी करती।पर उसे मालूम नहीं कि इस संसार में कोई किसी को दुःख देने वाला नहीं है, सब अपने ही कर्मों का फल है। 'सुमन' चारदीवारी के बाहर, विवर्ण मुख और अधःशिर किए बैठी है। उसकी आँखें नम हैं व केश विच्छिन्न हैं, जिससे उसका मुख ढका है। है।" सूर्य की लालिमा उसके तन पर पड़ रही है, तब भी वह दुखों के काले सागर में डूबी जा रही है; मानो अब उस अबला के लिए तड़पना ही उसका सफर बन गया हो। वह जैसे पति-प्रतीक्षा में बिकल है, वैसे ही प्रकृति भी अपनी अनमोल छटा से विचल है। वह बार-बार विधाता को दोष देती है और कहती है— "हाँ देव! तू सच-सच बता... तूने मेरे ख्वाबों और इरादों को पत्थर तो नहीं बना दिया? क्या सूर्य के बिना दिन और चंद्रमा के बिना रात शोभा पा सकते हैं? नहीं न... फिर मैं अपने पति के बिना कैसे शोभा पा सकती हूँ? क्या तुझे एक-दूजे की जुदाई का तजुर्बा नहीं? अगर नहीं, तो इस 'प्रेम-जगत' में 'आ'... और आकर देख... तेरी बनाई इस कठोर धरती पर, तेरा यह मिट्टी का खिलौना (पुतला) प्रेम के लिए कितना 'अधीर' है कि काश हमें मुट्ठी भर प्रेम मिल जाता, तो हमारे इस मिट्टी के खिलौने में जान आ जाती।"आगे वह कहने लगी— "जब 'अब दिन फिरेंगे' तो मैं जी भरकर देखूँगी। हाँ देव! अब विलम्ब न कर... उन्हें घर की चौखट तक ला दे। यह तुमसे मेरा आर्तनाद है और एक दुहाई भी। हाँ, लोगों को यह भ्रम है कि मैंने अपने पति (मधुसूदन) को घर से तू-तू, मैं-मैं करके और मुँह फुलाकर निकाल दिया है; पर तुम तो सर्वज्ञ हो, तुम्हें मालूम है कि मैंने उन्हें सप्रेम गले मिलकर किस्मत बनाने और जिंदगी सँवारने के लिए भेजा है।"
अतः ये आँखें उनकी प्रतीक्षा में कब से राह सजाए खड़ी हैं। अंततः एक दिन मधुसूदन बीते हुए मौसम की तरह अपनी पत्नी सुमन के पास लौट आया और पति से गले लगते ही सुमन झूम उठी; मानो बहारों के आने पर मुरझाई कली खिल रही हो।
मधुसूदन ने हँसते हुए पूछा— "क्या हुआ सुमन? तुम इतनी बेचैन क्यों हो? क्या मैं इस 'प्रेम-जगत' में आकर सचमुच खो गया था? अगर हाँ, मैं खो गया था, तो क्या मेरा प्रेम भी इस जगत से खो गया था?" इन सवालों के जवाब सुमन न दे सकी और अपनी बहारों में महकने लगी।
शिवराज आनंद
Monday, September 29, 2014
माँ कि महिमा
माँ! हम आए तेरी शरण में, नित छुएँ चरण, मम निवेदन स्वीकार करो!
है यही भाव-भजन, मन लगी लगन, मम-जीवन निर्माण करो!हम सब बाल-पौधे माँ! तू माँ, माली साथ है।
तू जननी! हम लाल, सब तेरे हाथ हैं॥जग सृजनी! दे तू जैसी आकृति, सब तेरा उपहार है।
हम सब कच्ची मिट्टी, तू सबका कुंभकार है॥तू भू की रानी, तू अम्बर की न्यारी माँ।
तुझमें बसी दुनिया सारी, तुझसे तरी दुनिया सारी।हे स्नेहमयी माँ!
तेरी गोद में हम हैं सोए, तुझ संग मिलकर हम हैं रोए।
तेरे आँचल में हमने खेला! तेरे आँचल में हमने खाया!तूने हमें कहा—आँखों का तारा!
हमने तुझे कहा—ध्रुव का तारा!!राम-कृष्ण, भीष्म-युधिष्ठिर तूने बनाया॥
सच है कि कर्ण-अर्जुन, बुद्ध-महावीर तूने ही बनाया।
तेरी महिमा अपार माँ! तेरी महिमा अपार।हे नित्य माता! तूने ही गाँधी-मालवीय को, शंकर-रामानुज,
हिय का अमिय-रस पिलाया॥
तेरी महिमा अपार माँ! तेरी महिमा अपार...हे माँ! हमें भी शरण दो, मन की कुबुद्धि हर दो।
हे वरदायिनी वर दो, जीवन धीर-वीर कर दो।माँ! मेरे जीवन की बगिया नित्य खिलती रहे।
तुझसे बनी साँस की डोर चलती रहे॥माँ! तू बस इतना करम कर दे,
निज वत्स का इतना धरम कर दे।
हम झुकाएँ शीश, तू हमें शुभाशीष दे-दे॥
Saturday, June 14, 2014
घर का भेद
घर का भेद
"मन रूपी घर के भेद को संभालना ही जीवन का महामंत्र है।"
"औरों के लिए रूपनाथ जैसे भी हों, पर जानकीनाथ जी के लिए तो वह नेक ही थे।" तभी तो जानकीनाथ की उनसे थोड़ी सी दोस्ती क्या हो गई, उन्होंने अपनी बेटी 'मंगली' का विवाह उनके पुत्र दयाराम से कर दिया। उन्होंने इस अल्प दोस्ती के अंधेपन में लड़के के शील-स्वभाव को नहीं देखा। इसी वजह से आज उन्हें अपनी बेटी की आँखों से गिरते आँसू देखने पड़ रहे हैं। यह सब उसी नज़रअंदाज़ करने का अंजाम है।
मंगली घर के बाहर बैठी थी। वह बार-बार मूर्छित होकर अपनी एक बड़ी चूक (भूल) को याद कर रही थी—वह 'घर का भेद'…! "ओह! मैंने अच्छा नहीं किया जो अपने हृदय की कच्ची चिट्ठी खोल दी।"क्या मैं स्वंय बदली अपनी नियति?
"हाँ, ससुराल में जैसा भी साग-पात मिलता, खाती तो खाती। नींद भर न सोती तो न सही। मुझे दुनियाभर का प्रेम न मिलता तो न सही… मैं मुट्ठी भर प्रेम में ही जी लेती, किन्तु इस भेद को कभी न खोलती कि मेरा पति एक व्यभिचारी और दुराचारी है।"घर के चार दीवारी के बाहर निकलते ही यह भेद चार दिन में चारों ओर मच गया। फिर किसी ने 'मंगली' को गलत ठहराया तो किसी ने दयाराम को, दयाराम तो गलत ठहराने के योग्य था ही, किन्तु मंगली नहीं... मंगली तो पाक थी गंगा सी।पर इस दुनिया को क्या कभी इधर तो कभी उधर होते रहती है पर क्या कभी पाला भी अग्निनि के समीप जा सकता है नहीं न। ससुराल की बातें चारदीवारी के बाहर आते ही विकृत हो गईं। जिन पड़ोसियों के सामने उसने अपना दुखड़ा रोया था, वे ही अब पीठ पीछे उपेक्षा कर रहे थे और मजे ले रहे थे। दयाराम की करतूतें तो पहले से ही झूठ की तरह साफ थीं, लेकिन अब समाज मंगली के चरित्र पर भी आरोप लगाने से बाज नहीं आ रहा था। जब जानकीनाथ को अपनी इस गंभीर भूल का वास्तविक ज्ञान हुआ, तो वे अत्यधिक विस्मित और व्याकुल हो उठे। अपनी पुत्री की अत्यंत दयनीय स्थिति को देखकर वे गहरे शोक में डूब गए। उन्हें रह-रहकर यही तीव्र पश्चाताप सता रहा था कि रूपनाथ के प्रलोभनकारी शब्दों के भ्रम में आकर उन्होंने अपनी लाडली को अगाध संकट में ढकेल दिया।दूसरी ओर दयाराम, जो पूर्व से ही कलुषित और संकुचित हृदय का था, इस बात से अत्यधिक क्रोधित हो उठा। अपनी चोरी पकड़े जाने पर लज्जित होने के स्थान पर वह उग्रता पर उतर आया और दूसरों पर ही दोषारोपण करने लगा। इसके पश्चात उसने मंगली को और अधिक प्रताड़ित करना प्रारंभ कर दिया। मंगली इस घोर विपत्ति से निकलने का निरंतर प्रयास कर रही थी, लेकिन उसे हर दिशा में केवल घोर निराशा ही दिखाई दे रही थी। वह भली-भांति समझ चुकी थी कि इस निर्दयी संसार में अपनी अंतर्भावनाओं को प्रकट करना, किसी कपटी को संरक्षण देने जैसा ही भयावह और आत्मघाती है।परंतु अब जानकीनाथ ने दयाराम को दंडित करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था। अपनी बेटी की दुर्दशा देखकर उनका मन अत्यधिक क्षुब्ध हो उठा। उन्होंने निश्चित किया कि अब वे मौन नहीं रहेंगे। अगली ही सुबह, वे समाज के गणमान्य और सम्मानित लोगों को साथ लेकर दयाराम के द्वार पर जा पहुँचे। उन्होंने भरी पंचायत में दयाराम के समस्त अनैतिक कृत्यों को सबके सामने पूर्णतः उजागर कर दिया। दयाराम ने स्वयं को बचाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन अकाट्य साक्ष्यों के आगे उसकी एक न चली और वह पूर्णतः निरुत्तर हो गया।
जब पुलिस को बुलाने की बात आई, तो दयाराम अत्यंत भयभीत होकर जानकीनाथ के पैरों में गिर पड़ा। जानकीनाथ ने उसे हमेशा के लिए अपनी जिंदगी से निष्कासित कर दिया और मंगली को अपने घर ले आए। अब मंगली की आँखें खुल चुकी थीं, लेकिन उसका मन एक अजीब अंतर्द्वंद्व में डूबा हुआ था। अंततः उसने खुद को समझाया कि जो हो गया सो हो गया, अब इस जीवन को रोते हुए नहीं गँवाना है।
मंगली ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे। उसने समझ लिया कि अब 'हाथ पर हाथ धरे बैठने' से काम नहीं चलेगा। भले ही दुनिया उसे गलत ठहराए, पर वह 'गंगा सी पाक' थी और अपनी इस पवित्रता को दुनिया के तानों की 'अग्नि' में भस्म नहीं होने देगी। उसने अपनी तकदीर खुद बदलने के लिए 'कमर कस ली'।पिता जानकीनाथ का सिर भी समाज के सामने झुक गया था। अपनी 'अल्प दोस्ती के अंधत्व' की भारी कीमत वे चुका रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी का हौसला बढ़ाया और कहा, "बेटी, समाज का काम तो 'राई का पहाड़ बनाना' है। तू हिम्मत मत हार। हम दोनों मिलकर इस विपत्ति का सामना करेंगे।" मंगली ने घर के भीतर रहकर ही सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू किया। उसकी लगन और कला ऐसी थी कि देखते ही देखते उसके काम का डंका चारों ओर बजने लगा। दूसरी तरफ दयाराम का घमंड चूर-चूर हो गया। अपनी बुरी आदतों के कारण वह कौड़ी-कौड़ी को मोहताज हो गया और उसकी रही-सही इज्जत भी 'मिट्टी में मिल गई'। समाज ने भी उससे मुँह मोड़ लिया।मंगली अब 'मुट्ठी भर प्रेम' की भीख माँगने वाली लाचार नारी नहीं थी। वह अपने पैरों पर खड़ी होकर समाज के लिए एक मिसाल बन चुकी थी। दिन दयाराम पैर घसीटते हुए जानकीनाथ के दुआर पर आ पहुँचा। उसके कलुषित भाव अब पश्चाताप की अग्नि में सुलग रहे थे। दयाराम को देखते ही जानकीनाथ का खून खौल उठा। दयाराम ने सिर झुकाकर कहा, "ससुर जी, मुझसे बड़ी भूल हुई। मैंने मंगली का शील-स्वभाव नहीं समझा। मुझे क्षमा कर दीजिए।" जानकीनाथ ने गरजकर कहा, "दयाराम! अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। 'अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत'।" मंगली भीतर से निकलकर दुआर पर आई। उसकी आँखों में अब वह पुरानी मुर्च्छा नहीं, बल्कि सूरज जैसी तपिश थी। उसने दयाराम से सीधे शब्दों में कहा, "दयाराम, तुम्हारे जैसे दुराचारी के लिए मेरे मन में मुट्ठी भर प्रेम भी शेष नहीं है।" दयाराम का 'घमंड चूर-चूर' हो चुका था। वह बिना कुछ बोले उल्टे पाँव लौट गया। ग्रामीण जो कल तक मंगली को गलत ठहरा रहे थे, आज उसकी इस दृढ़ता और स्वाभिमान को देखकर 'दाँतों तले उँगली दबाने' लगे।
Sunday, January 26, 2014
जीवन की सोच
"लफ़्ज़ों से कैसे कहूँ कि मेरे जीवन की सोच क्या थी? आखिर मैंने भी सोचा था कि पुलिस बनूँगा, डॉक्टर बनूँगा, किसी की सहायता करके ऊँचा नाम कमाऊँगा। पर नाम कमाने की बात तो दूर... ज़िंदगी ऐसी लड़खड़ा गई जैसे शीशे का टुकड़ा गिर पड़ा हो। फ़र्क इतना सा हो गया जितना जीव और निर्जीव में होता है। मैं क्यों निष्फल हुआ?हाँ, मैं जिस कार्य को करता था उसमें सफल होने की आशा नहीं करता था। मेहनत और लगन से जी चुराता था, इसलिए मेरी सोच पर पानी फिर गया। गुड़-गोबर हो गया। अगर मैंने मेहनत और लगन से जी लगाया होता, तो कोई भी मंज़िल पा सकता था, ऊँचा नाम कमा सकता था। अभी भी मेरे मन में कसक होती है जब वे लम्हें याद आते हैं और दिल के टुकड़े-टुकड़े कर जाते हैं कि काश, मैं उस दौर में समय की कीमत को जाना और समझा होता; जिस समय को यूँ ही खेल-कूद, मौज-मस्ती में लुटा दिया। बहरहाल, अब मैं गड़े मुर्दे उखाड़कर दिल को ठेस नहीं पहुँचाऊँगा... वरन उन दिलों में नव-नींव डालकर भविष्य का सृजन करूँगा। हाँ, मैं अल्पज्ञ हूँ, किंतु इतना साक्षर भी हूँ कि अच्छे और बुरे व्यक्ति की पहचान कर सकूँ। उन दोनों की तस्वीर समाज के सामने खींच सकूँ। फिर यह कह सकूँ कि सत्यवान और कुटेव की सोच में ज़मीन और आसमान से भी अधिक अंतर होता है; चाहे क्यों न एक-दूजे का मिलन होता हो, मतभेद ज़रूर होता है।उन दोनों की ख़्वाहिश अलग सी होती है, ख़्वाबों में पृथक-पृथक इरादे लाते हैं—सुकृत्य और कुकृत्य। सुकृत्यों में जो स्थान किसी की सहायता करना, भूले-भटके हुए को वापस लाना या यह कहें कि ऐसे सुकर्म हैं जिनका फल सुखद होता है; वहीं कुकृत्य करने वाले की सोच किसी की ज़िल्लत करना, किसी पर इल्ज़ाम लगाने जैसे अशोभनीय और निंदनीय कर्मों में लगी रहती है।सभी कर्मों का इतिहास 'कर्म साक्षी' है। फिर कैसे राजा लंकेश के कपट-कर्म और मन के कलुषित-भाव ने उसके साथ समूची लंका का पतन कर डाला! 'माना कि झूठ की आड़ से किसी की ज़िंदगी सलामत हो जाती है, तो उस वक्त के लिए झूठ बोलना सौ-सौ सत्य के समान है।' परंतु निष्प्रयोजन मिथ्यात्व क्यों? फिर तो इस संसार में सत्य और सत्यवान की भी परीक्षा हुई है और सार्थक सोच की शक्ति ने विजय पाई है। महापुरुष हों या साधारण व्यक्ति, सभी पारिवारिक स्थिति में मलिन होकर विषम परिस्थितियों में खोए रहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि संपूर्ण जीवन की सोच सत्कर्म में होनी चाहिए। मैं यह नहीं कह सकता कि सिर्फ सोच रखने से सदा आप सफल हो जाएँगे, किंतु यदि मेहनत, लगन और विश्वास के साथ रहे, तो एक दिन चाँद-तारे भी तोड़ लाएंगे। कहीं आप भी ऐसा कार्य न कर बैठें कि बाद में आपको आठ-आठ आँसू रोना पड़े। आज मुझे मालूम हुआ कि जीवन की सोच कैसी होनी चाहिए। मैं तो असफल हुआ; ओस चाटने से मेरी प्यास नहीं बुझी। लेकिन आप ज्ञानवान हैं, सोच-समझकर कार्य करें। आत्मविश्वास और मन की एकाग्रता से काम लें, नहीं तो आपको भी आठ-आठ आँसू रोने पड़ेंगे।"
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