घर का भेद
"मन रूपी घर के भेद को संभालना ही जीवन का महामंत्र है।"
"औरों के लिए रूपनाथ जैसे भी हों, पर जानकीनाथ जी के लिए तो वह नेक ही थे।" तभी तो जानकीनाथ की उनसे थोड़ी सी दोस्ती क्या हुई, उन्होंने अपनी बेटी 'मंगली' का विवाह उनके पुत्र दयाराम से कर दिया। उन्होंने इस अल्प दोस्ती के अंधेपन में लड़के के शील-स्वभाव को नहीं देखा। इसी वजह से आज उन्हें अपनी बेटी की आँखों से गिरते आँसू देखने पड़ रहे हैं। यह सब उसी नज़रअंदाज़ करने का अंजाम है।
मंगली घर के बाहर बैठी थी। वह बार-बार मूर्छित होकर अपनी एक बड़ी चूक (भूल) को याद कर रही थी—वह 'घर का भेद'...! "ओह! मैंने अच्छा नहीं किया जो अपने हृदय की कच्ची चिट्ठी खोल दी।" "क्या मैं स्वयं बदलो, अपनी नियति?" "हाँ, ससुराल में जैसा भी साग-पात मिलता, खाती तो खाती। नींद भर न सोती तो न सही। मुझे दुनिया भर का प्रेम न मिलता तो न सही...! मैं मुट्ठी भर प्रेम में ही जी लेती, किन्तु इस भेद को कभी न खोलती कि मेरा पति एक व्यभिचारी और दुराचारी है।" 'घर के चार दीवारी के बाहर निकलते ही यह भेद चार दिन में चारों ओर मच गया।' फिर किसी ने 'मंगली' को गलत ठहराया तो किसी ने दयाराम को; दयाराम को गलत ठहराने के योग्य था ही, किन्तु मंगली नहीं... मंगली तो पाक थी, गंगा सी। पर इस दुनिया को क्या, कभी इधर तो कभी उधर होते रहती है। पर क्या कभी पाला भी अग्नि के समीप जा सकता है? नहीं न! ससुराल की बातें चारदीवारी के बाहर आते ही विकृत हो गईं। जिन पड़ोसियों के सामने उसने अपना दुखड़ा रोया था, वे ही अब पीठ पीछे उपेक्षा कर रहे थे और मजे ले रहे थे। दयाराम की करतूतें तो पहले से ही झूठ की तरफ साफ थीं, लेकिन अब समाज मंगली के चरित्र पर भी आरोप लगाने से बाज़ नहीं आ रहा था।
जब जानकीनाथ को अपनी इस गंभीर भूल का वास्तविक ज्ञान हुआ, तो वे अत्यधिक विस्मित और व्याकुल हो उठे। अपनी पुत्री की अत्यंत दयनीय स्थिति को देखकर वे गहरे शोक में डूब गए। उन्हें रह-रहकर यही तीव्र पश्चाताप सता रहा था कि रूपनाथ के प्रलोभनकारी शब्दों के भ्रम में आकर उन्होंने अपनी लाडली को अगाध संकट में धकेल दिया। दूसरी ओर दयाराम, जो पूर्व से ही कलुषित और संकुचित हृदय का था, इस बात से अत्यधिक क्रोधित हो उठा। अपनी चोरी पकड़े जाने पर लज्जित होने के स्थान पर वह उग्रता पर उतर आया और दूसरों पर ही दोषारोपण करने लगा। इसके पश्चात उसने मंगली को और अधिक प्रताड़ित करना प्रारंभ कर दिया। मंगली इस घोर विपत्ति से निकलने का निरंतर प्रयास कर रही थी, लेकिन उसे हर दिशा में केवल घोर निराशा ही दिखाई दे रही थी। वह भली-भांति समझ चुकी थी कि इस निर्दयी संसार में अपनी अंतर्भावनाओं को प्रकट करना, किसी कपटी को संरक्षण देने जैसा ही भयानक और आत्मघाती है।
परंतु अब जानकीनाथ ने दयाराम को दंडित करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था। अपनी बेटी की दुर्दशा देखकर उनका मन अत्यधिक क्षुब्ध हो उठा। उन्होंने निश्चित किया कि अब वे मौन नहीं रहेंगे। अगली ही सुबह, वे समाज के गणमान्य और सम्मानित लोगों को साथ लेकर दयाराम के द्वार पर जा पहुँचे। उन्होंने भरी पंचायत में दयाराम के समस्त अनैतिक कृत्यों को सबके सामने पूर्णतः उजागर कर दिया। दयाराम ने स्वयं को बचाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन अकाट्य साक्ष्यों के आगे उसकी एक न चली और वह पूर्णतः निरुत्तर हो गया।पंचायत के कठोर न्याय और सामाजिक बहिष्कार के भय ने अंततः दयाराम के कलुषित अहंकार को विगलित कर दिया। आत्मग्लानि और पश्चाताप के अश्रुओं में भीगकर वह भरी सभा में नतमस्तक हुआ और मंगली से जीवनदान की याचना करने लगा।
पितृ-सम्मान की रक्षा और समाज के मनीषियों के आश्वासन पर, गंगा सदृश पावन मंगली ने प्रतिशोध के स्थान पर करुणा को चुना। उसने अपनी नियति को एक नया अवसर देते हुए, परिमार्जित हो चुके दयाराम को क्षमादान की अमूल्य भिक्षा दे दी।
तदुपरान्त, मंगली ने पुनः अपनी ससुराल की देहली पर कदम रखा, किंतु इस बार वह असहाय पीड़िता नहीं, अपितु महिमामयी गृहलक्ष्मी थी। सुधर चुके दयाराम के हृदय-मंच पर अब मंगली के प्रति अगाध निष्ठा, अनुराग और अपार सम्मान का भाव जाग्रत हो चुका था।
समय के चक्र के साथ समाज के मिथ्या लांछन स्वतः ही विलीन हो गए और पूर्व का वह कटु 'घर का भेद' लुप्त हो गया। अब दोनों का गृहस्थ जीवन लोक-लाज की सीमाओं से परे, एक शांत, आत्मीय और सुखी दाम्पत्य के शाश्वत संसार में परिणत हो चुका था।
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