Monday, September 29, 2014

माँ कि महिमा

माँ! हम आए तेरी शरण में, नित छुएँ चरण, मम निवेदन स्वीकार करो!
है यही भाव-भजन, मन लगी लगन, मम-जीवन निर्माण करो!
हम सब बाल-पौधे माँ! तू माँ, माली साथ है।
तू जननी! हम लाल, सब तेरे हाथ हैं॥
जग सृजनी! दे तू जैसी आकृति, सब तेरा उपहार है।
हम सब कच्ची मिट्टी, तू सबका कुंभकार है॥
तू भू की रानी, तू अम्बर की न्यारी माँ।
तुझमें बसी दुनिया सारी, तुझसे तरी दुनिया सारी।
हे स्नेहमयी माँ!
तेरी गोद में हम हैं सोए, तुझ संग मिलकर हम हैं रोए।
तेरे आँचल में हमने खेला! तेरे आँचल में हमने खाया!
तूने हमें कहा—आँखों का तारा!
हमने तुझे कहा—ध्रुव का तारा!!
राम-कृष्ण, भीष्म-युधिष्ठिर तूने बनाया॥
सच है कि कर्ण-अर्जुन, बुद्ध-महावीर तूने ही बनाया।
तेरी महिमा अपार माँ! तेरी महिमा अपार।
हे नित्य माता! तूने ही गाँधी-मालवीय को, शंकर-रामानुज,
हिय का अमिय-रस पिलाया॥
तेरी महिमा अपार माँ! तेरी महिमा अपार...
हे माँ! हमें भी शरण दो, मन की कुबुद्धि हर दो।
हे वरदायिनी वर दो, जीवन धीर-वीर कर दो।
माँ! मेरे जीवन की बगिया नित्य खिलती रहे।
तुझसे बनी साँस की डोर चलती रहे॥
माँ! तू बस इतना करम कर दे,
निज वत्स का इतना धरम कर दे।
हम झुकाएँ शीश, तू हमें शुभाशीष दे-दे॥

Sunday, January 26, 2014

जीवन की सोच

"लफ़्ज़ों से कैसे कहूँ कि मेरे जीवन की सोच क्या थी? आखिर मैंने भी सोचा था कि पुलिस बनूँगा, डॉक्टर बनूँगा, किसी की सहायता करके ऊँचा नाम कमाऊँगा। पर नाम कमाने की बात तो दूर... ज़िंदगी ऐसी लड़खड़ा गई जैसे शीशे का टुकड़ा गिर पड़ा हो। फ़र्क इतना सा हो गया जितना जीव और निर्जीव में होता है। मैं क्यों निष्फल हुआ?
हाँ, मैं जिस कार्य को करता था उसमें सफल होने की आशा नहीं करता था। मेहनत और लगन से जी चुराता था, इसलिए मेरी सोच पर पानी फिर गया। गुड़-गोबर हो गया। अगर मैंने मेहनत और लगन से जी लगाया होता, तो कोई भी मंज़िल पा सकता था, ऊँचा नाम कमा सकता था। अभी भी मेरे मन में कसक होती है जब वे लम्हें याद आते हैं और दिल के टुकड़े-टुकड़े कर जाते हैं कि काश, मैं उस दौर में समय की कीमत को जाना और समझा होता; जिस समय को यूँ ही खेल-कूद, मौज-मस्ती में लुटा दिया। बहरहाल, अब मैं गड़े मुर्दे उखाड़कर दिल को ठेस नहीं पहुँचाऊँगा... वरन उन दिलों में नव-नींव डालकर भविष्य का सृजन करूँगा। हाँ, मैं अल्पज्ञ हूँ, किंतु इतना साक्षर भी हूँ कि अच्छे और बुरे व्यक्ति की पहचान कर सकूँ। उन दोनों की तस्वीर समाज के सामने खींच सकूँ। फिर यह कह सकूँ कि सत्यवान और कुटेव की सोच में ज़मीन और आसमान से भी अधिक अंतर होता है; चाहे क्यों न एक-दूजे का मिलन होता हो, मतभेद ज़रूर होता है।
उन दोनों की ख़्वाहिश अलग सी होती है, ख़्वाबों में पृथक-पृथक इरादे लाते हैं—सुकृत्य और कुकृत्य। सुकृत्यों में जो स्थान किसी की सहायता करना, भूले-भटके हुए को वापस लाना या यह कहें कि ऐसे सुकर्म हैं जिनका फल सुखद होता है; वहीं कुकृत्य करने वाले की सोच किसी की ज़िल्लत करना, किसी पर इल्ज़ाम लगाने जैसे अशोभनीय और निंदनीय कर्मों में लगी रहती है।
सभी कर्मों का इतिहास 'कर्म साक्षी' है। फिर कैसे राजा लंकेश के कपट-कर्म और मन के कलुषित-भाव ने उसके साथ समूची लंका का पतन कर डाला! 'माना कि झूठ की आड़ से किसी की ज़िंदगी सलामत हो जाती है, तो उस वक्त के लिए झूठ बोलना सौ-सौ सत्य के समान है।' परंतु निष्प्रयोजन मिथ्यात्व क्यों? फिर तो इस संसार में सत्य और सत्यवान की भी परीक्षा हुई है और सार्थक सोच की शक्ति ने विजय पाई है। महापुरुष हों या साधारण व्यक्ति, सभी पारिवारिक स्थिति में मलिन होकर विषम परिस्थितियों में खोए रहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि संपूर्ण जीवन की सोच सत्कर्म में होनी चाहिए। मैं यह नहीं कह सकता कि सिर्फ सोच रखने से सदा आप सफल हो जाएँगे, किंतु यदि मेहनत, लगन और विश्वास के साथ रहे, तो एक दिन चाँद-तारे भी तोड़ लाएंगे। कहीं आप भी ऐसा कार्य न कर बैठें कि बाद में आपको आठ-आठ आँसू रोना पड़े। आज मुझे मालूम हुआ कि जीवन की सोच कैसी होनी चाहिए। मैं तो असफल हुआ; ओस चाटने से मेरी प्यास नहीं बुझी। लेकिन आप ज्ञानवान हैं, सोच-समझकर कार्य करें। आत्मविश्वास और मन की एकाग्रता से काम लें, नहीं तो आपको भी आठ-आठ आँसू रोने पड़ेंगे।"                            


Friday, November 8, 2013

जगत का जंजाल - संसृति

मनुष्यों को अपने हृदय की सुबुद्धि से दीपशिखा जलानी चाहिए। उन्हें एक-दूसरे के मध्य भेदभाव डालकर मौज-मस्ती नहीं करनी चाहिए। मौज-मस्ती दो पल की भूल है, उनकी कुबुद्धि का फल शूल है।
इस प्रकृति के ‘विशद-अंक’ में कलिकाल की संसृति का “श्रीगणेश” होता है; जहाँ सुख आने पर आनंद सुखित हो जाता है, वहीं दुख आने पर सुप्त-व्यथा जागृत होती है। उसी प्रकृति के विशद अंक में एक छोटा-सा गाँव है—दामनपुर, जो चारों ओर नदियों से घिरा हुआ है। कहीं–कहीं खुले मैदान हैं, तो किसानों का चाँद तोड़ने जैसा काम भी है। लोग अपनी–अपनी संस्कृति से जुड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। वहीं पथ के किनारे आम्र–पीपल के द्रुम लगे हुए हैं, जिससे शीतल समीर बह रही है और प्यारे अभिन्न निमग्न हो रहे हैं। वहाँ के अधिकांश ग्रामीण अल्पज्ञ हैं। वे किसी को ठेस लगाकर नहीं, अपितु खून-पसीना बहाकर अपनी जीविका चलाते हैं। वे अपने काम के आगे भगवान को स्मरण करना भूल जाते हैं; परेशानी सहन कर सकते हैं, किन्तु पराजित नहीं।"
 उसी गाँव में दानिक राम और भोजराम नामक दो भाई निवास करते हैं। वे दोनों भाई तो एक हैं, परंतु दोनों का स्वभाव एक जैसा नहीं है। पराई चीज़ों पर आँखें गड़ाना बड़े भाई दानिक राम का पेशा है। लालच ने उन्हें अंधा बना दिया है, मानो कुबेर का धन पाकर भी उन्हें संतोष नहीं और बगैर संतोष के लालच का नाश कहाँ? हाँ, छोटे भाई भोजराम शील-स्वभाव के हैं। उन्हें दुनिया का लालच नहीं है, सिर्फ़ दो वक़्त की रोटी पर भरोसा है। वे लक्ष्मण के चरण-चिह्नों पर चलने वाले हैं। उनके भीतर बड़े भाई के प्रति सेवा व समर्पण के भाव हैं। तभी तो वे दानिक राम के हर उड़ते तीर को झेलते रहे, पर उन्हें क्या पता कि वे राम न होकर एक प्रपंची ठहरे...।""
     असल में, दानिक राम अपने आप को छोटे भाई भोजराम की अपेक्षा ज़्यादा समृद्ध और संपन्न समझते हैं, परंतु उससे भी ज़्यादा उनमें अहंकार है। वे नित्य रामायण का पाठ भी करते हैं, तब भी तुलसीदास जी के उस महान सिद्धांत को भूल ही जाते हैं जिसमें लिखा है—सत्य वचन बोलना चाहिए, सत्य कर्म और सत्य विचार से रहना चाहिए। हाँ, वे इस सिद्धांत को पढ़ते ज़रूर हैं, किंतु इसे अपनी हकीकत की दुनिया में नहीं उतार पाते। वे दुनिया के श्रेष्ठ ग्रंथों में से एक ‘श्रीरामचरितमानस’ में यह भी पढ़ते हैं कि 'भाई की भुजा भाई ही होता है।' फिर उसी भाई से वैमनस्यता किसलिए? तू-तू, मैं-मैं क्यों?""
   माना कि दानिक राम के पास वैभव-वस्तु विपुल है, पर प्रलय की अपेक्षा जीवन तो विथुर ही है न? फिर ऐसा अहंकार क्यों, मानो प्रलय के बाद भी जीवन का नाश नहीं होगा! दानिक राम के अहंकार-रूपी दीमक ने छोटे भाई के प्रेम-भाव-रूपी मखमल को चाट लिया है। वे यह समझ नहीं पा रहे हैं कि छोटे भाई भोजराम की झोपड़ी में अपनों का प्यार और दूसरों का आदर भी है। वे ग़रूर की आँखों से संसार को देखते हैं कि 'मेरे पास क्या नहीं है? सब कुछ तो है और उसके पास एक टूटी-फूटी झोपड़ी है, जिसमें खाने-पीने के लाले (तेरह-बाईस) पड़े हैं। वह तो भूख की मार से मारा-मारा फिरता है।' शायद बड़े भाई दानिक राम को संसार की वास्तविकता का ठीक-ठीक बोध नहीं है कि इस संसार में राजाओं का राज हो या धनवानों का धन, सब क्षणिक होता है। फिर गर्व किसलिए?"
"वे आधी खोपड़ी के जाहिल व्यक्ति हैं, जो साधारण सी ज़िंदगी को लेकर ऊँच-नीच के कार्य करते हैं। कभी किसी की जिल्लत करते हैं, तो कभी किसी पर इल्ज़ाम लगाते हैं; किन्तु जब इन कर्मों के परिणाम समीप आते हैं, तब वे चल नहीं पाते। जैसे-जैसे उनके जीवन की अंतिम घड़ियाँ आने लगती हैं, उनके जीवन का हर कर्म बोलने लगता है।दानिक राम के दो पुत्र हैं—कार्तिकेश्वर व अचिन्त कुमार। कार्तिकेश्वर एक शराबी है, जबकि अचिन्त कुमार सिविल कोर्ट, दामन पुर का मशहूर वकील है। उसकी नीति अलग ही है—‘वह सत्य का घोर विरोधी है।’ उसकी पत्नी अपाहिज है, जो पति के प्रपंचों के आगे परेशान रहती है, तब भी तन-मन-धन से पति के चरणों में प्रेम रखती है। वह एक धर्मपत्नी होने के नाते यह जानती है कि दान और तीर्थ से बढ़कर भी पति की सेवा है। एक दिन अनायास ही कार्तिकेश्वर शराब के नशे में मदमस्त होकर अपने काका भोजराम को मारने दौड़ा। अब भोजराम क्या करते? वे भागते-भागते पुलिस थाने जा पहुँचे। पुलिस आरक्षक ने देखते ही भोजराम को सलाम किया, क्योंकि वे गांधी टोपी और कुर्ता पहने हुए थे। तत्पश्चात, पुलिस ने कार्तिकेश्वर को दो हाथ लगाते हुए कारावास में डाल दिया, मानो दानिक राम के पहाड़ जैसे अहंकार को एक सबक मिल गया हो। लेकिन फूंक से पहाड़ कहाँ उड़ने वाला?"
"(कुछ दिनों बाद) जब वह जेलखाने से बाहर आया, तो पुनः वही बर्ताव करने लगा। आखिर कब तक? एक दिन दानिक राम की आँखों से ग़रूर का चश्मा उतर गया। अब उनके पास उस ग़रूर के चश्मे को पहनने के लिए आँखें ही नहीं रहीं, क्योंकि अचानक वकील अचिन्त कुमार इस दुनिया से चल बसा! उन्हें जिस धन-दौलत पर गर्व था, उसी धन-दौलत ने उनका साथ छोड़ दिया। फिर पैसा-पैसा किसलिए? क्या पैसों के बल पर यमराज ने वकील अचिन्त कुमार की जान बख़्शी? नहीं न! वे अपने बीते कल के कुकर्मों के कारण आने वाले कल को खो बैठे।
   जगत के जंजाल में आकर दानिक राम ने अपने पुत्र वकील अचिन्त कुमार को तो (मोह में) बाँध लिया था, किन्तु अपने अहंकार को नहीं बाँध पाए। इस जगत के ‘जंजाल’ में आकर अहंकार को नहीं, अपितु उस राम-नाम को भजना चाहिए, जिनका नाम ‘अनइच्छित हूँ अपवर्ग निसेही’ है। फिर अहंकार किसलिए? क्या केवल मायाजाल और मोहिनी में फँसने के लिए?प्रकृति के विशद अंक में कलिकाल की इस संसृति (भव, जन्म-मरण) का अंततः 'जय श्रीराम' हो जाता है।"

Tuesday, December 6, 2011

भूत ...

(अंद्विश्वास की कुरीतियों को दूर करने के लिए एक कथा भूत ...।)
आँधी व घटा तो आती ही रहती थी पर जिस दिन श्याम बाबू अपने बेटे को खेल सिखाने के लिए खेल के मैदान में ले जा रहे थे। उस दिन इतनी भयंकर आँधी आई की श्याम बाबू चल न सके, अचानक गिर पड़े । उन्हें देखकर कुछ ऐसा प्रतीत हो रहा था
   मानो निष्प्राण है पर  उनकी सहसा आँखें खुली तो देखा एक बूढी औरत उनके करीब आ रही थी ।  श्याम बाबू भय रहित आँखों से पर्दा हटाया और लोहा लेने के लिए तैयार हो गए। उनके इस वीरता को देख वह बूढी औरत काफूर हो चली ... आखिर श्याम बाबू को संदेह हो गया कि 'भूत' ही है।

वे उतना भूत -प्रेतों से  परिचित नहीं थे , बस इतना सुना  था कि एक व्यक्ति के मर जाने पर उसके बदन पर असुर वृत्तियों  के सूचक  और पंजे थे। आप-बीती से  सहमें ... बस उसी को नज़र में बसाते ...। की ओ ......। खेल का मैदान ...... मेरा पुत्र .. और...वह बुढ़िया ...। वह कोई जादू तो नहीं ... वे मन को घोड़ें की तरह दौड़ने लगे ...। आखिर उनके साथ ऐसी पहली घटना थी । श्याम बाबू के निवास-स्थल में उसी रात कोई मुस्लमान अज़ीमउल्लाखां नाम का व्यक्ति आया था, वह बता रहा था की जब मैं दिन में चलता हूँ तो लगता है कि न जाने मैं कितने किलोमीटर सफर कर चुका हूं और जब घर जाता हूं तो लगता है काफ़ी थका सा हूं। मेरे  हाथ-पाएं फुल जाते हैं।  उसकी बातों को सुनकर श्याम बाबू को एक पल के लिए लगा की उसे कोई बीमारी तो नहीं ... पर वे भूत की गाथा सुन चुके थे, फिर उन्हें  भय हो गया की भूत  ही है।  एक रोज़  श्याम बाबू एक वैध (चिकित्सक)को बुलाने के लिए  जा रहे थे, कि अचानक आवाज़ आई- कृपया सुनिए जनाब- वे आवाज़ को विस्मृत कर कदम बढ़ाते गए .. फिर इतनी ज्यादा अट्टास आने लगी, की वे कांतिहीन होकर विपरीत दिशा में चल पड़े।  उनके साथ एक घटना और घटी जब वे रात को शौचक्रिया के लिए जा रहा थे। रात अँधेरी थी। चूड़ियों की खनक, पायल की  झंकार बज रही थी। वे झटपट होते चले। उन्हें लगा की कोई माया तो नहीं ...। अब वे क्या करते ? जिंदगी सँवारने का अब दूसरा रास्ता  भी तो न था .. बस एक भूत को भागना था । आखिर
 एक दिन श्याम बाबू जिंदगी और मौत के बीच खड़े होकर भूत को भागने का फैसला लिए ...। वे सभी से बोले - अपने हृदय से भय को निकाल दो। अंततः एक दिन भूत की कथा हो गयी लुप्त, सिर्फ नाम ही रह गया। आज उसी गांव में लोग कलेजा ठंडा कर जीवन गुजार रहे हैं ।

एक दिन वे कहने लगे कि वे लोग आधी खोपड़ी के थे, जो न समझ पा  रहे थे की भय से बहुत होता है। हाँ, मैं तो अल्पज्ञ हुं अपनी नज़र से तो कह सकता हूँ कि भय से ही  भूत होता है किन्तु  दुनिया नज़र से यह कैसे कह सकता हूं की वास्तव में भूत होते हैं या अन्धविश्वास की कथा ? यह प्रश्न आप लोगों से करता हूँ। 
                           शिवराज आनंद 

Monday, January 31, 2011

हम कलियुग के प्राणी हैं

Tuesday, January 11, 2011

बेवफ़ा 'अपनों के लिए...

बेवफा ! अपनों के लिए ...
     ओ ' धन्य ' जिसने आंख बन्द होते हुए भी दुनिया के  हसीन  नजारों को  देख लिया था .
         सात  सुरों के  संगीत  को  अपने  सांसो  मे  बसा  लिया था पर उसके  असल जिंदगी का  अंजाम क्या  हुआ? जो  नम्रता  के  साथ  प्यार - वयार  के चक्कर में  था भूल गया था कि ऐसेे  रेत का महल  बनाने से  क्या फायदा  जो   खुद  -ब- खुद  टूट  के  बिखर  जाये .उसे एहसास  ही नही  था कि  एक दिन   नम्रता  उससे  दूर ...दूर  दुनिया  मे गुम  हो  जायेगी . आखिर  ऐसा  क्या  हुआ  उसके   साथ?
            हैलो,  नम्रता  कैसी हो ...?
                              धन्य  ने  तार के  सहारे  पुछा .पढाई  के  सिलसिले  मे  नम्रता  शहर  गयी  हुई  थी.
         मै  बिल्कुल  ठीक  हूं धन्य .मेरी पढाई जैसे  ही  पूरी  होगी  मै  तुुम्हारे पास आ जााऊंगी ...जवाब देती  हुई  नम्रता  बोली.
 'तो कब  आ रही हो नम्रता?   तुम बिन  मुझे कुछ भी  अच्छा नही लगता  ...धन्य  ने कहा.
      मैं क्या करुं धन्य ..तुमसे  दूर  तो जाना मै  भी  नही   चाहती  थी पर... नम्रता  बोली .
  मैं सच  कह  रहा हूं नम्रता  हर पल  हर घडी   मुझे  तेरी ही याद  आती है  और  मैं उन  यादों से बेहाल हो  जाता हूं.
  हां, नम्रता  तेरे जाने के बाद  मेरी  जिन्दगी वीरान  सी लगती है .एक पल भी  सुकून  नही  मिलता
...सिर्फ  और सिर्फ बेचैनी .कुछ ऐसे ही  बेताबी के आलम मे धन्य  ने कहा.
      बचपन  मे  दोनों  ही  एक साथ एक  ही स्कूल  में पढाई किये  थे तब से  दोनो  एक दुसरे  से प्यार करने   लगे.और धन्य  भी  नम्रता  को अपना  मानने लगा. धन्य  नम्रता  के बिना अपने आप को एकान्त  महसूस  करने  लगा .अब तुम आ भी  जाओ  नम्रता ...तेरे  आने से मेरे उजड़े जिन्दगी  मे फिर से  बहार   आ जायेगी.अब और मुझसे  रहा जाता...बेताबी  के आलम मे धन्य ने कहा .
           असल बात  धन्य  और नम्रता  कक्षा  6 वी से एक  ही विधालय मे पढते थे.दोनों की  गहरी दोस्ती  हो गई .  किसी  पार्टी  या  समारोह  में साथ -साथ  आने -जाने  लगे .जब ये सारी बात  नम्रता  के  पिता को  मालुम  हुआ  कि मेरी तीन -पांच मे आगे  है  अगर  उसे  दो -चार  लगा  दुंगा  तो कही नौ दो ग्यारह  ना हो जाए .इस  लिए  उन्होंने मतंग पुर के राज निहित  के लडके  से नम्रता  की शादी  तय कर दी . धन्य  नम्रता  को लेकर  न जाने कितने  सपने  संजोता . उन दोनो  का तार के  सहारे  ही  बात  होता था.फिरसे एक दिन  धन्य  तार के सहारे पुछा  कि जब तुम  मुझसे  इतना  बेइंतहा  प्यार  करती हो तो क्यों नही मेेेर  पास आ जाती ...और हमारे बीच  के  दूरि यो  को मिटा  देती. तुम  फिक्र  मत करो धन्य  मेरी पढाई जैसे ही पूरी होगी मै आजाऊॅगी. क्या  करुं  मुझे  भी  यहां एक पल अच्छा  नही लगता है  फिरभी  दिल के जख्मों  को  सी सी कर जी  रही हूं. नम्रता बोली .

         धन्य  ' अमीर  खान  की तरह  स्मार्ट  था. वह  हाथ मे चूड़ा और  टी- शर्ट आदि  पहनने का शौकीन  था . हर रोज सुबह     और शाम  आईने  के  साथ   काटता .एक दिन  हसी -खुशी  के  साथ  मस्त  माहौल  मे  बैैठकर  नम्रता  के साथ  गुजारे पलों  को याद  कर रहा था  कि वे भी कोई  दिन थे  जब  हम पहली बार किसी  पार्टी  मे मिले थे  लाल शूट पहने  मुझे  नम्रता भा गई थी .मुझे  ऐसा लग रहा था कि  मै ही  नम्रता  का  सच्चा  प्रेमी हूं. तभी  अचानक  फोन की घंटी बजी ...फोन  था  नम्रता  का.धन्य ने  फोन  उठाया  ..बोला  कैसे  नम्रता?  आ रही  हो न ?मै  बस तुम्हारा  ही इन्तजार  कर रहा हूं .क्या तुम  बिना बताए आकर के मुझे  सरप्राइज  देना चाहती हो ,  मै सब जानता हूं.धन्य और कुछ  कहता  इससे  पहले  की फोन कट चुकी थी फिर फोन  की घंटी  बजी ... इधर से धन्य  फोन  उठाते  ही पहले  जैसा  दुहराया ...बोला  -क्या हुआ  नम्रता  सब ठीक  तो है?  मगर  उधर से  जवाब  सुनते ही  धन्य सन्न रह गया वही  गिर पडा .   मानो उसके  चमकती  जिंदगी  मे अंधेरा छा  गया हो . ये तुने क्या  किया  नम्रता?  तुम  तो कहती थी हमारे  प्यार  के रंग  कभी नही  छुटेंगे...हमारे  रिश्ते  अटूट  है कभी  नही  टुटेंगे. क्या  तेरा ओ वादा ...ओ इरादा  सिर्फ  झूठे प्यार  का सौदा  था? ऐ दुनिया  वालो इस दुनिया  मे  अब  प्रेम ,प्रेम  नही  रहा  ...इक धोखा  बन गया है .जिसे अपना समझो वही  पराया हो जाता है .उन्होंने  तो  बङी  आसानी से कह दिया  ' आई हैट  यू '...  एक पल के लिए भी नही  सोचा  कि  उनके  ऐसा  कहने से  हमारे नाजुक  दिल पर  क्या  गुजरेगी? अब   हम किसके लिए इस जहां मे जीयेें ? तुने  क्योंकि  बेवफाई  नम्रता?  किसके लिए .. ?"अपनों के लिए ".खैर अब इन बातों से हमें क्या  लेना -देना  ?लेना देना  है  तो  अपने  सार्थक  सांसो  से ...जो  जीवन  जीने  की कला  सिखा   सके .






     

 

                                ध्र

सेवा संकल्प अभियान 2026

किरणेश तिथि सप्त दश से मही पर राष्ट्र अर्चन दीप जला, भाद्रपद के नव विहान से आश्विन तक यह दिव्य अनुष्ठान चला। शरद वत्सर पंचविंशति की साधना से...