Saturday, October 12, 2019

दबंग दुनिया समाचार पत्र का आभार






दबंग दुनिया समाचार पत्र के संवादाता का आभार की उन्होंने ने मुझे अपनी लोक प्रिय समाचार पत्र के प्रकाशन दिनांक 1 अक्टूबर 2019 में स्थान दिया. 

Wednesday, November 15, 2017

मानवता की 'डगर' पर

प्यारे! प्यारे! तुम मुझे भी अपना लो,
गुमराह हूँ, कोई राह दिखा दो।
यूँ न छोड़ो एकाकी अभिमन्यु सा रण पर
मुझे भी साथ ले चलो मानवता की डगर पर॥  
    
वहाँ बड़े सत्यवादी हैं,
सत्य-अहिंसा के पुजारी हैं।
वे रावण के अत्याचार को मिटा देते हैं,
हो गर हाहाकार, तो सिमटा देते हैं॥
 
   इस पथ में कोई ज़ंजीर नहीं,
      जो बाँधकर जकड़ सके।
    पथ में कोई विघ्न नहीं,
      जो रोककर अकड़ सके।। 

है यह मानवता की डगर निराली,
जीत ले जो प्रेम, वही खिलाड़ी।
यहाँ मज़हब न भेदभाव,
सर्वधर्म समभाव से जीते हैं,
वक़्त आए तो हँस के ज़हर पीते हैं॥

फिर तो स्वर्ग यहीं है, नर्क यहीं है,
मानव मानव ही है, बस सोच का फ़र्क़ है।
ओ प्यारे! इस राह से हम न हों किनारे,
न हताश हों, न निराश हों,
मन में आस व विश्वास हो॥

फिर आओ जग में जीकर,
जीवन-ज्योत जला दें।
सुख-शांति के नगर को,
स्वर्ग सा सजा दें।
आज भी राम हैं कण-कण में,
भारत-भारती के जन-जन को बता दें॥
(तुकान्त मुक्त छंद)

Tuesday, January 17, 2017

उठो युवा,तुम उठो ऐसे. . .


उठो युवा तुम उठो ऐसे
उठो युवा तुम उठो ऐसे
चक्रवात में तूफ़ाँ उठता है जैसे
हाँ, अब कौन युवा तुम्हारे सिवा?
रक्षक प्यारे देश के
तुम चाहते तो तांडव मचे
देर है तुम्हारे उस वेश क

अब तो सब से आशा भी टूटी
लगती है अब दुनिया भी झूठी
कैसी माँ? कि कैसा लाल?
जो जनकर भी जने क्या लाल?
जो देश की गरिमा बचा सके
ध्वंस कर रावण-राज धरा से
एक आदर्श रामराज्य बना सके

तुम देश के आन-बान हो
हिंदू हो या मुसलमान हो
किसी मज़हब के नहीं, तुम मातृभूमि के लाल हो
तुम काल के भी महाकाल हो
फिर क्यों अंजान हो?
क्या नेताओं से परेशान हो?
ओह! कहीं विलीन न हो मेरे सपनों का भारत!
हे महारत! तुममें है सामर्थ्य
रोक दो यह अनर्थ
अगर है मोहब्बत, तो अपनी यौवन शक्ति जगा दो। 
आज अपने युग से अत्याचार मिटा दो।। 





Tuesday, June 28, 2016

घर का भेद

              घर का भेद
 "मन रूपी घर के भेद को संभालना ही जीवन का महामंत्र है।"
"औरों के लिए रूपनाथ जैसे भी हों, पर जानकीनाथ जी के लिए तो वह नेक ही थे।" तभी तो जानकीनाथ की उनसे थोड़ी सी दोस्ती क्या हो गई, उन्होंने अपनी बेटी 'मंगली' का विवाह उनके पुत्र दयाराम से कर दिया। उन्होंने इस अल्प दोस्ती के अंधेपन में लड़के के शील-स्वभाव को नहीं देखा। इसी वजह से आज उन्हें अपनी बेटी की आँखों से गिरते आँसू देखने पड़ रहे हैं। यह सब उसी नज़रअंदाज़ करने का अंजाम है।
मंगली घर के बाहर बैठी थी। वह बार-बार मूर्छित होकर अपनी एक बड़ी चूक (भूल) को याद कर रही थी—वह 'घर का भेद'…! "ओह! मैंने अच्छा नहीं किया जो अपने हृदय की कच्ची चिट्ठी खोल दी।"क्या मैं स्वंय बदली अपनी नियति? 
"हाँ, ससुराल में जैसा भी साग-पात मिलता, खाती तो खाती। नींद भर न सोती तो न सही। मुझे दुनियाभर का प्रेम न मिलता तो न सही… मैं मुट्ठी भर प्रेम में ही जी लेती, किन्तु इस भेद को कभी न खोलती कि मेरा पति एक व्यभिचारी और दुराचारी  है।"घर के चार दीवारी के बाहर निकलते ही यह भेद चार दिन में चारों ओर मच गया। फिर किसी ने 'मंगली' को गलत ठहराया तो किसी ने दयाराम को, दयाराम तो गलत ठहराने के योग्य था ही, किन्तु मंगली नहीं... मंगली तो पाक थी गंगा सी।पर इस दुनिया को क्या कभी इधर तो कभी उधर होते रहती है पर क्या कभी पाला भी अग्निनि के समीप जा सकता है नहीं न। ससुराल की बातें चारदीवारी के बाहर आते ही विकृत हो गईं। जिन पड़ोसियों के सामने उसने अपना दुखड़ा रोया था, वे ही अब पीठ पीछे उपेक्षा कर रहे थे और मजे ले रहे थे। दयाराम की करतूतें तो पहले से ही झूठ की तरह साफ थीं, लेकिन अब समाज मंगली के चरित्र पर भी आरोप लगाने से बाज नहीं आ रहा था। जब जानकीनाथ को अपनी इस गंभीर भूल का वास्तविक ज्ञान हुआ, तो वे अत्यधिक विस्मित और व्याकुल हो उठे। अपनी पुत्री की अत्यंत दयनीय स्थिति को देखकर वे गहरे शोक में डूब गए। उन्हें रह-रहकर यही तीव्र पश्चाताप सता रहा था कि रूपनाथ के प्रलोभनकारी शब्दों के भ्रम में आकर उन्होंने अपनी लाडली को अगाध संकट में ढकेल दिया।दूसरी ओर दयाराम, जो पूर्व से ही कलुषित और संकुचित हृदय का था, इस बात से अत्यधिक क्रोधित हो उठा। अपनी चोरी पकड़े जाने पर लज्जित होने के स्थान पर वह उग्रता पर उतर आया और दूसरों पर ही दोषारोपण करने लगा। इसके पश्चात उसने मंगली को और अधिक प्रताड़ित करना प्रारंभ कर दिया। मंगली इस घोर विपत्ति से निकलने का निरंतर प्रयास कर रही थी, लेकिन उसे हर दिशा में केवल घोर निराशा ही दिखाई दे रही थी। वह भली-भांति समझ चुकी थी कि इस निर्दयी संसार में अपनी अंतर्भावनाओं को प्रकट करना, किसी कपटी को संरक्षण देने जैसा ही भयावह और आत्मघाती है।परंतु अब जानकीनाथ ने दयाराम को दंडित करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था। अपनी बेटी की दुर्दशा देखकर उनका मन अत्यधिक क्षुब्ध हो उठा। उन्होंने निश्चित किया कि अब वे मौन नहीं रहेंगे। अगली ही सुबह, वे समाज के गणमान्य और सम्मानित लोगों को साथ लेकर दयाराम के द्वार पर जा पहुँचे। उन्होंने भरी पंचायत में दयाराम के समस्त अनैतिक कृत्यों को सबके सामने पूर्णतः उजागर कर दिया। दयाराम ने स्वयं को बचाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन अकाट्य साक्ष्यों के आगे उसकी एक न चली और वह पूर्णतः निरुत्तर हो गया।
जब पुलिस को बुलाने की बात आई, तो दयाराम अत्यंत भयभीत होकर जानकीनाथ के पैरों में गिर पड़ा। जानकीनाथ ने उसे हमेशा के लिए अपनी जिंदगी से निष्कासित कर दिया और मंगली को अपने घर ले आए। अब मंगली की आँखें खुल चुकी थीं, लेकिन उसका मन एक अजीब अंतर्द्वंद्व में डूबा हुआ था। अंततः उसने खुद को समझाया कि जो हो गया सो हो गया, अब इस जीवन को रोते हुए नहीं गँवाना है।
      मंगली ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे। उसने समझ लिया कि अब 'हाथ पर हाथ धरे बैठने' से काम नहीं चलेगा। भले ही दुनिया उसे गलत ठहराए, पर वह 'गंगा सी पाक' थी और अपनी इस पवित्रता को दुनिया के तानों की 'अग्नि' में भस्म नहीं होने देगी। उसने अपनी तकदीर खुद बदलने के लिए 'कमर कस ली'।पिता जानकीनाथ का सिर भी समाज के सामने झुक गया था। अपनी 'अल्प दोस्ती के अंधत्व' की भारी कीमत वे चुका रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी का हौसला बढ़ाया और कहा, "बेटी, समाज का काम तो 'राई का पहाड़ बनाना' है। तू हिम्मत मत हार। हम दोनों मिलकर इस विपत्ति का सामना करेंगे।" मंगली ने घर के भीतर रहकर ही सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू किया। उसकी लगन और कला ऐसी थी कि देखते ही देखते उसके काम का डंका चारों ओर बजने लगा। दूसरी तरफ दयाराम का घमंड चूर-चूर हो गया। अपनी बुरी आदतों के कारण वह कौड़ी-कौड़ी को मोहताज हो गया और उसकी रही-सही इज्जत भी 'मिट्टी में मिल गई'। समाज ने भी उससे मुँह मोड़ लिया।मंगली अब 'मुट्ठी भर प्रेम' की भीख माँगने वाली लाचार नारी नहीं थी। वह अपने पैरों पर खड़ी होकर समाज के लिए एक मिसाल बन चुकी थी।  दिन दयाराम पैर घसीटते हुए जानकीनाथ के दुआर पर आ पहुँचा। उसके कलुषित भाव अब पश्चाताप की अग्नि में सुलग रहे थे। दयाराम को देखते ही जानकीनाथ का खून खौल उठा। दयाराम ने सिर झुकाकर कहा, "ससुर जी, मुझसे बड़ी भूल हुई। मैंने मंगली का शील-स्वभाव नहीं समझा। मुझे क्षमा कर दीजिए।" जानकीनाथ ने गरजकर कहा, "दयाराम!  अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। 'अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत'।" मंगली भीतर से निकलकर दुआर पर आई। उसकी आँखों में अब वह पुरानी मुर्च्छा नहीं, बल्कि सूरज जैसी तपिश थी। उसने दयाराम से सीधे शब्दों में कहा, "दयाराम,   तुम्हारे जैसे दुराचारी के लिए मेरे मन में मुट्ठी भर प्रेम भी शेष नहीं है।" दयाराम का 'घमंड चूर-चूर' हो चुका था। वह बिना कुछ बोले उल्टे पाँव लौट गया। ग्रामीण जो कल तक मंगली को गलत ठहरा रहे थे, आज उसकी इस दृढ़ता और स्वाभिमान को देखकर 'दाँतों तले उँगली दबाने' लगे।

Monday, March 9, 2015

मेरी आवाज़

मेरे मुख-मंडल पर सिर्फ एक ही बात का संशय बना रहता है। मैं दिनों-दिन हो रहे दंगा-फसाद, चोरी-डकैती जैसे विषयों पर उलझा रहता हूँ। आखिर ऐसी लूटपाट कब तक चलेगी? ऐसे में क्या हम अपनी मंजिल तक पहुँचने में कामयाब हो पाएंगे? हम मानते हैं कि प्रत्येक प्राणी प्रकृति से जकड़ा है, तब भी उन्हें अपना जीवन जीने में झंझट क्यों है? क्योंकि हम सबको यह भय है कि हमारे साँसों की डोरियाँ कब टूट जाएँगी।"मैं देश के हित में जान गंवा दूँ, चेहरे पर काली पट्टी बाँधकर नाम बदल दूँ, किंतु अपनी आवाज़ को नहीं बदल सकता..." 'यह मेरी आवाज़' देश व समाज में सुरीति लाना चाहती है, एक नया परिवर्तन लाना चाहती है, जिससे देश व समाज की संस्कृति कायम रह सके। स्वदेश को एक अखंड देश बनाने के साथ ही हम हिमालय के सदृश देश का गौरव ऊँचा कर सकें।मेरे मन की आवाज़ के साथ उन गरीबों की भी आवाज़ जुड़ी है, जो सामने कहने से कतराते हैं, कह नहीं सकते... पर मेरा मन ऐसा ही कहता है। यह आवाज़ आपकी हमसाया बनकर, देश की पहचान बनकर शाश्वत (अमर) रहेगी।ऐसे स्वदेश का नवनिर्माण करना आकाश-कुसुम (असंभव) नहीं है, यदि प्रथम गुरु (माता-पिता) अपने बच्चों को अच्छी सीख दें। मैं कब तक देश की दयनीय दशा देखकर इन आँखों से आँसू बहाऊँगा? मैं कब तक देश व समाज के बोझ को कंधों का सहारा दूँगा? आखिर कब तक? जब तक मेरी साँसों की डोरियाँ चलेंगी और ये आँखें दुनिया देखेंगी, तब तक बस न! फिर आगे...? आखिर उन्हें किसी की जिंदगी के साथ मौत का खेल खेलने में क्या मिलता है? बस देश व समाज की तौहीन... और क्या? ऐसे ही भाव मन में लाकर मैं खोया रहता हूँ। मुझे नींद नहीं आती... क्या हमारा जीवन इन कर्मों से महान होगा, यदि हमारे मन, वचन और आचरण पवित्र न हों?हमें अपना आचरण बदलना होगा और ऐसे आचरण रूपी ढाल को अपनाना होगा, जिससे देश व समाज की संस्कृति की रक्षा हो सके। अंततः मेरी आशा है कि एक दिन मेरे "मन की आवाज़" उनके मस्तिष्क में घड़ी की सुई सी अवश्य घूमेगी। तब उनका हृदय भावुक होगा। एक दिन उनके भी 'दिन फिरेंगे', तो वे भविष्य का सृजन करेंगे। एक दिन ज़रूर ममत्व जागृत होगा, तब मैं अपने दिल की नगरी में कह सकूँगा– “ईश्वर की कृपा से सब कुशल है”।

जियो उनके लिए

जियो उनके लिए
मेरे जीने की आस ज़िंदगी से कोसों दूर चली गई थी कि अब मेरा कौन है? मैं किसके लिए अपना आंचल पसारूँगा? पर देखा—लोक-लोचन में असीम वेदना। तब मेरा हृदय मर्मांतक हो गया, फिर मुझे ख्याल आया कि अब मुझे जीना होगा, हाँ, अपने स्वार्थ के लिए न सही, परमार्थ के लिए ही।
मैं ज़माने का निकृष्ट था, तब देखा उस सूर्य को कि वह निःस्वार्थ भाव से कालिमा में लालिमा फैला रहा है, तो क्यों न मैं भी उसके सदृश बनूँ। भला-मानुष बन सुप्त मनुष्यत्व को जाग्रत करूँ। मैंने शनैः-शनैः सद्मानुष की आँखों से देखा—लोग असह्य दर्द से विकल हैं, उन पर ग़म व दर्दों का पहाड़ टूट पड़ा है और चक्षु-जल ही जलधि बन पड़ा है। फिर तो मैं एक पल के लिए विस्मित हो गया। मेरा कलेजा मुँह को आने लगा। परन्तु दूसरे क्षण वही कलेजा ठंडा होता गया और मैंने चक्षु-जल से बने जलधि को रोक दिया; क्योंकि तब तक मैं भी दुनिया का एक अंश बन गया था।
किन्तु अब मेरी सांसें लड़खड़ाने लगी हैं, जो मैंने उठाया था ग़म व दर्दों के पहाड़ से भार, वह पुनः गिरने लगा है। अतः हे भाई! अब मैं उनके लिए तुम्हारे पास, आस लेकर आँचल पसारता हूँ... और कहता हूँ तुम उन अंधों की आँख बन जाओ, तुम उन लंगड़ों के पैर बन जाओ और जियो 'उनके लिए'। क्या तुम उनके लिए जी सकोगे? या तुम भी उन जन्मांधों के सदृश काम (वासना) में अंधे बने रहोगे?
राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही कहा है–
'जीना तो है उसी का,
जिसने यह राज़ जाना है।
है काम आदमी का,
औरों के काम आना है।।'

यहाँ उनका भी 'दिल' जोड़ दो

यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो,

जिनके दिल टूटे हैं, चलते कदम थमे हैं,
वे न जीना जानते हैं,
न ज़ख़्मों को सीना जानते हैं।
प्यारे, तुम उन्हें भी अपना लो । 
 मेरी बात मान, विश्व-बंधुत्व का भाव लेकर, जन-जन से बैर-भाव छोड़ दो।
 "यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो"।। 

हम सबके ओ प्यारे, किस कदर हैं दूर किनारे?
जीत की भी आस रखते हैं वे मन मारे।
ये मन मैले नहीं, निर्मल हैं; 
सबल न सही, निर्बल हैं।
समझते हैं हम जिन्हें पीछे हैं,
वे कदम-दो कदम ही पीछे हैं,
जो हिला दे उन्हें, ऐसी आँधी का रुख मोड़ दो।
यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो।।

दिल बिना क्या यह महफ़िल है?
क्या जीने के सपने हैं?
बेगाना कोई नहीं, सब अपने हैं।

ये सब मन के अनुभव हैं;
नहीं हूँ अभी वह, पहले मैं था जो।
सुना था मैंने मरना ही दुखद है,
पर देखा लालसाओं के साथ जीना,
महादुखद है।

फिर क्या है सुख?
क्या जीवन का सार?
सुख है सबके हितार्थ में,
जीवन का सार है अपनत्व में—
ऐसा अपनत्व जो एक-दूजे का दिल जोड़ दे,
कोई गुमनाम न हो, नाम जोड़ दे।
वरना सब असार है चोला,
सब राम-रोला भाई, सब राम-रोला।।
यहाँ उनका भी दिल जोड़ दो - शिवराज आनंद

सेवा संकल्प अभियान 2026

किरणेश तिथि सप्त दश से मही पर राष्ट्र अर्चन दीप जला, भाद्रपद के नव विहान से आश्विन तक यह दिव्य अनुष्ठान चला। शरद वत्सर पंचविंशति की साधना से...