Wednesday, January 29, 2020

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं

हे वरदायिनी मुझे वर दे मैं नित्य आपका उपासक बन आप की सेवा करना रहूं। बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं जय सरस्वती..

Monday, January 13, 2020

गौरव सूरजपुर का (कविता)

गौरव सूरजपुर का (कविता)

विंध्य की गोद में सोती, अनुपम छटा निराली है,
महानदी की निर्मल धारा, लाती यहाँ खुशहाली है।

सरगुजा के आँचल से जनमा, यह अनुपम भू-भाग प्रिय,
सूरजपुर की पावन माटी, सबको लगती प्राणप्रिय।

कुदरगढ़ की ऊँची चोटी पर, माँ बागेश्वरी का धाम यहाँ,
श्रद्धा से झुकता मस्तक है, मिलता मन को विश्राम यहाँ।

भैयाथान की इस धरती पर, गूँजे आस्था के पावन स्वर,
आशीष बरसता रहता है, इस सुंदर पावन आँचल पर।

रक्सगंडा के जलप्रपात में, झर-झर झरता राग नया,
तमोर पिंगला के जंगलों में, वन्यजीवों का बाग नया।

शाल और सागौन के वृक्ष यहाँ, पहने हरी-हरी चूनर हैं,
कोयले की इस काली धरा में, छिपे अनमोल हुनर हैं।

गोंड, पंडो और चेरवा की, यह सुंदर अनुपम थाती है,
करमा, सुआ और सैला धुन पर, झूम उठती यह माटी है।

सरल हृदय और सहज भाव हैं, यहाँ के सीधे लोगों में,
अमृत रस घुला हुआ सा है, यहाँ के मीठे बोलों में।

धान के खेतों में लहराती, यहाँ श्रम की सच्ची गाथा है,
महान और रेणुक की लहरों में, कल-कल बहता साता है।

हे सूरजपुर! तेरी माटी का, कण-कण एक अनमोल रतन,
शत-शत नमन है तुझको सुंदर, जय-जय छत्तीसगढ़ के चमन!

दक्षिण के आँचल में पावन, शिवपुर की सुंदर गुफा महान,
प्राकृतिक जल से अभिषेकित, बैठे हैं भोले भगवान।

रामगढ़ की पावन सीमा छू, दक्षिण का कोना मुस्काता,
कण-कण में मर्यादा पुरुषोत्तम, राम का पावन नाम समाता।

पूर्व दिशा के पावन पथ पर, वैभव का उजियारा है,
देवीपुर में माँ महामाया ने, अपना रूप संवारा है।

पंच मंदिर की सुंदर मूरत, मन में श्रद्धा जगाती है,
सूरजपुर की पूरब बेला, अलख अलौकिक जगाती है।

पश्चिम में सरासोर की महिमा, गंगा जैसी पावन धार,
महानदी की लहरें करतीं, भोले का नित ही शृंगार।

ऋषि-मुनियों की इस तपोभूमि में, बहता भक्ति का मधुमास,
पश्चिम की यह पावन माटी, लाती जीवन में उल्लास।

पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, चारों धाम यहाँ सुखकारी,
सत्य, सनातन, सरल भाव की, बहती सुंदर रसधारी।

हे सूरजपुर! तेरी माटी का, कण-कण एक अनमोल रतन,
शत-शत नमन है तुझको सुंदर, जय-जय छत्तीसगढ़ के चमन!

Saturday, October 12, 2019

दबंग दुनिया समाचार पत्र का आभार






दबंग दुनिया समाचार पत्र के संवादाता का आभार की उन्होंने ने मुझे अपनी लोक प्रिय समाचार पत्र के प्रकाशन दिनांक 1 अक्टूबर 2019 में स्थान दिया. 

Thursday, June 28, 2018

घर का भेद

              घर का भेद
 "मन रूपी घर के भेद को संभालना ही जीवन का महामंत्र है।"
"औरों के लिए रूपनाथ जैसे भी हों, पर जानकीनाथ जी के लिए तो वह नेक ही थे।" तभी तो जानकीनाथ की उनसे थोड़ी सी दोस्ती क्या हो गई, उन्होंने अपनी बेटी 'मंगली' का विवाह उनके पुत्र दयाराम से कर दिया। उन्होंने इस अल्प दोस्ती के अंधेपन में लड़के के शील-स्वभाव को नहीं देखा। इसी वजह से आज उन्हें अपनी बेटी की आँखों से गिरते आँसू देखने पड़ रहे हैं। यह सब उसी नज़रअंदाज़ करने का अंजाम है।
मंगली घर के बाहर बैठी थी। वह बार-बार मूर्छित होकर अपनी एक बड़ी चूक (भूल) को याद कर रही थी—वह 'घर का भेद'…! "ओह! मैंने अच्छा नहीं किया जो अपने हृदय की कच्ची चिट्ठी खोल दी।"क्या मैं स्वंय बदली अपनी नियति? 
"हाँ, ससुराल में जैसा भी साग-पात मिलता, खाती तो खाती। नींद भर न सोती तो न सही। मुझे दुनियाभर का प्रेम न मिलता तो न सही… मैं मुट्ठी भर प्रेम में ही जी लेती, किन्तु इस भेद को कभी न खोलती कि मेरा पति एक व्यभिचारी और दुराचारी  है।"घर के चार दीवारी के बाहर निकलते ही यह भेद चार दिन में चारों ओर मच गया। फिर किसी ने 'मंगली' को गलत ठहराया तो किसी ने दयाराम को, दयाराम तो गलत ठहराने के योग्य था ही, किन्तु मंगली नहीं... मंगली तो पाक थी गंगा सी।पर इस दुनिया को क्या कभी इधर तो कभी उधर होते रहती है पर क्या कभी पाला भी अग्निनि के समीप जा सकता है नहीं न। ससुराल की बातें चारदीवारी के बाहर आते ही विकृत हो गईं। जिन पड़ोसियों के सामने उसने अपना दुखड़ा रोया था, वे ही अब पीठ पीछे उपेक्षा कर रहे थे और मजे ले रहे थे। दयाराम की करतूतें तो पहले से ही झूठ की तरह साफ थीं, लेकिन अब समाज मंगली के चरित्र पर भी आरोप लगाने से बाज नहीं आ रहा था। जब जानकीनाथ को अपनी इस गंभीर भूल का वास्तविक ज्ञान हुआ, तो वे अत्यधिक विस्मित और व्याकुल हो उठे। अपनी पुत्री की अत्यंत दयनीय स्थिति को देखकर वे गहरे शोक में डूब गए। उन्हें रह-रहकर यही तीव्र पश्चाताप सता रहा था कि रूपनाथ के प्रलोभनकारी शब्दों के भ्रम में आकर उन्होंने अपनी लाडली को अगाध संकट में ढकेल दिया।दूसरी ओर दयाराम, जो पूर्व से ही कलुषित और संकुचित हृदय का था, इस बात से अत्यधिक क्रोधित हो उठा। अपनी चोरी पकड़े जाने पर लज्जित होने के स्थान पर वह उग्रता पर उतर आया और दूसरों पर ही दोषारोपण करने लगा। इसके पश्चात उसने मंगली को और अधिक प्रताड़ित करना प्रारंभ कर दिया। मंगली इस घोर विपत्ति से निकलने का निरंतर प्रयास कर रही थी, लेकिन उसे हर दिशा में केवल घोर निराशा ही दिखाई दे रही थी। वह भली-भांति समझ चुकी थी कि इस निर्दयी संसार में अपनी अंतर्भावनाओं को प्रकट करना, किसी कपटी को संरक्षण देने जैसा ही भयावह और आत्मघाती है।परंतु अब जानकीनाथ ने दयाराम को दंडित करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था। अपनी बेटी की दुर्दशा देखकर उनका मन अत्यधिक क्षुब्ध हो उठा। उन्होंने निश्चित किया कि अब वे मौन नहीं रहेंगे। अगली ही सुबह, वे समाज के गणमान्य और सम्मानित लोगों को साथ लेकर दयाराम के द्वार पर जा पहुँचे। उन्होंने भरी पंचायत में दयाराम के समस्त अनैतिक कृत्यों को सबके सामने पूर्णतः उजागर कर दिया। दयाराम ने स्वयं को बचाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन अकाट्य साक्ष्यों के आगे उसकी एक न चली और वह पूर्णतः निरुत्तर हो गया।
जब पुलिस को बुलाने की बात आई, तो दयाराम अत्यंत भयभीत होकर जानकीनाथ के पैरों में गिर पड़ा। जानकीनाथ ने उसे हमेशा के लिए अपनी जिंदगी से निष्कासित कर दिया और मंगली को अपने घर ले आए। अब मंगली की आँखें खुल चुकी थीं, लेकिन उसका मन एक अजीब अंतर्द्वंद्व में डूबा हुआ था। अंततः उसने खुद को समझाया कि जो हो गया सो हो गया, अब इस जीवन को रोते हुए नहीं गँवाना है।
      मंगली ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे। उसने समझ लिया कि अब 'हाथ पर हाथ धरे बैठने' से काम नहीं चलेगा। भले ही दुनिया उसे गलत ठहराए, पर वह 'गंगा सी पाक' थी और अपनी इस पवित्रता को दुनिया के तानों की 'अग्नि' में भस्म नहीं होने देगी। उसने अपनी तकदीर खुद बदलने के लिए 'कमर कस ली'।पिता जानकीनाथ का सिर भी समाज के सामने झुक गया था। अपनी 'अल्प दोस्ती के अंधत्व' की भारी कीमत वे चुका रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी का हौसला बढ़ाया और कहा, "बेटी, समाज का काम तो 'राई का पहाड़ बनाना' है। तू हिम्मत मत हार। हम दोनों मिलकर इस विपत्ति का सामना करेंगे।" मंगली ने घर के भीतर रहकर ही सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू किया। उसकी लगन और कला ऐसी थी कि देखते ही देखते उसके काम का डंका चारों ओर बजने लगा। दूसरी तरफ दयाराम का घमंड चूर-चूर हो गया। अपनी बुरी आदतों के कारण वह कौड़ी-कौड़ी को मोहताज हो गया और उसकी रही-सही इज्जत भी 'मिट्टी में मिल गई'। समाज ने भी उससे मुँह मोड़ लिया।मंगली अब 'मुट्ठी भर प्रेम' की भीख माँगने वाली लाचार नारी नहीं थी। वह अपने पैरों पर खड़ी होकर समाज के लिए एक मिसाल बन चुकी थी। उसने साबित कर दिया कि भले ही 'घर का भेद' खुलने से जीवन में भूचाल आ गया हो, पर आत्मबल हो तो इंसान राख से भी उठकर खड़ा हो सकता है।एक दिन दयाराम पैर घसीटते हुए जानकीनाथ के दुआर पर आ पहुँचा। उसके कलुषित भाव अब पश्चाताप की अग्नि में सुलग रहे थे। दयाराम को देखते ही जानकीनाथ का खून खौल उठा। दयाराम ने सिर झुकाकर कहा, "ससुर जी, मुझसे बड़ी भूल हुई। मैंने मंगली का शील-स्वभाव नहीं समझा। मुझे क्षमा कर दीजिए।" जानकीनाथ ने गरजकर कहा, "दयाराम!  अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। 'अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत'।" मंगली भीतर से निकलकर दुआर पर आई। उसकी आँखों में अब वह पुरानी मुर्च्छा नहीं, बल्कि सूरज जैसी तपिश थी। उसने दयाराम से सीधे शब्दों में कहा, "दयाराम,   तुम्हारे जैसे दुराचारी के लिए मेरे मन में मुट्ठी भर प्रेम भी शेष नहीं है।" दयाराम का 'घमंड चूर-चूर' हो चुका था। वह बिना कुछ बोले उल्टे पाँव लौट गया। ग्रामीण जो कल तक मंगली को गलत ठहरा रहे थे, आज उसकी इस दृढ़ता और स्वाभिमान को देखकर 'दाँतों तले उँगली दबाने' लगे।

Wednesday, November 15, 2017

मानवता की 'डगर' पर

प्यारे! प्यारे! तुम मुझे भी अपना लो,
गुमराह हूँ, कोई राह दिखा दो।
यूँ न छोड़ो एकाकी अभिमन्यु सा रण पर
मुझे भी साथ ले चलो मानवता की डगर पर॥  
    
वहाँ बड़े सत्यवादी हैं,
सत्य-अहिंसा के पुजारी हैं।
वे रावण के अत्याचार को मिटा देते हैं,
हो गर हाहाकार, तो सिमटा देते हैं॥
 
   इस पथ में कोई ज़ंजीर नहीं,
      जो बाँधकर जकड़ सके।
    पथ में कोई विघ्न नहीं,
      जो रोककर अकड़ सके।। 

है यह मानवता की डगर निराली,
जीत ले जो प्रेम, वही खिलाड़ी।
यहाँ मज़हब न भेदभाव,
सर्वधर्म समभाव से जीते हैं,
वक़्त आए तो हँस के ज़हर पीते हैं॥

फिर तो स्वर्ग यहीं है, नर्क यहीं है,
मानव मानव ही है, बस सोच का फ़र्क़ है।
ओ प्यारे! इस राह से हम न हों किनारे,
न हताश हों, न निराश हों,
मन में आस व विश्वास हो॥

फिर आओ जग में जीकर,
जीवन-ज्योत जला दें।
सुख-शांति के नगर को,
स्वर्ग सा सजा दें।
आज भी राम हैं कण-कण में,
भारत-भारती के जन-जन को बता दें॥

Tuesday, January 17, 2017

उठो युवा,तुम उठो ऐसे. . .


उठो युवा तुम उठो ऐसे
उठो युवा तुम उठो ऐसे
चक्रवात में तूफ़ाँ उठता है जैसे
हाँ, अब कौन युवा तुम्हारे सिवा?
रक्षक प्यारे देश के
तुम चाहते तो तांडव मचे
देर है तुम्हारे उस वेश क

अब तो सब से आशा भी टूटी
लगती है अब दुनिया भी झूठी
कैसी माँ? कि कैसा लाल?
जो जनकर भी जने क्या लाल?
जो देश की गरिमा बचा सके
ध्वंस कर रावण-राज धरा से
एक आदर्श रामराज्य बना सके

तुम देश के आन-बान हो
हिंदू हो या मुसलमान हो
किसी मज़हब के नहीं, तुम मातृभूमि के लाल हो
तुम काल के भी महाकाल हो
फिर क्यों अंजान हो?
क्या नेताओं से परेशान हो?
ओह! कहीं विलीन न हो मेरे सपनों का भारत!
हे महारत! तुममें है सामर्थ्य
रोक दो यह अनर्थ
अगर है मोहब्बत, तो अपनी यौवन शक्ति जगा दो। 
आज अपने युग से अत्याचार मिटा दो।। 





Wednesday, January 11, 2017

बेवफ़ा 'अपनों के लिए...

बेवफा ! अपनों के लिए ...
     ओ ' धन्य ' जिसने आंख बन्द होते हुए भी दुनिया के  हसीन  नजारों को  देख लिया था .
         सात  सुरों के  संगीत  को  अपने  सांसो  मे  बसा  लिया था पर उसके  असल जिंदगी का  अंजाम क्या  हुआ? जो  नम्रता  के  साथ  प्यार - वयार  के चक्कर में  था भूल गया था कि ऐसेे  रेत का महल  बनाने से  क्या फायदा  जो   खुद  -ब- खुद  टूट  के  बिखर  जाये .उसे एहसास  ही नही  था कि  एक दिन   नम्रता  उससे  दूर ...दूर  दुनिया  मे गुम  हो  जायेगी . आखिर  ऐसा  क्या  हुआ  उसके   साथ?
            हैलो,  नम्रता  कैसी हो ...?
                              धन्य  ने  तार के  सहारे  पुछा .पढाई  के  सिलसिले  मे  नम्रता  शहर  गयी  हुई  थी.
         मै  बिल्कुल  ठीक  हूं धन्य .मेरी पढाई जैसे  ही  पूरी  होगी  मै  तुुम्हारे पास आ जााऊंगी ...जवाब देती  हुई  नम्रता  बोली.
 'तो कब  आ रही हो नम्रता?   तुम बिन  मुझे कुछ भी  अच्छा नही लगता  ...धन्य  ने कहा.
      मैं क्या करुं धन्य ..तुमसे  दूर  तो जाना मै  भी  नही   चाहती  थी पर... नम्रता  बोली .
  मैं सच  कह  रहा हूं नम्रता  हर पल  हर घडी   मुझे  तेरी ही याद  आती है  और  मैं उन  यादों से बेहाल हो  जाता हूं.
  हां, नम्रता  तेरे जाने के बाद  मेरी  जिन्दगी वीरान  सी लगती है .एक पल भी  सुकून  नही  मिलता
...सिर्फ  और सिर्फ बेचैनी .कुछ ऐसे ही  बेताबी के आलम मे धन्य  ने कहा.
      बचपन  मे  दोनों  ही  एक साथ एक  ही स्कूल  में पढाई किये  थे तब से  दोनो  एक दुसरे  से प्यार करने   लगे.और धन्य  भी  नम्रता  को अपना  मानने लगा. धन्य  नम्रता  के बिना अपने आप को एकान्त  महसूस  करने  लगा .अब तुम आ भी  जाओ  नम्रता ...तेरे  आने से मेरे उजड़े जिन्दगी  मे फिर से  बहार   आ जायेगी.अब और मुझसे  रहा जाता...बेताबी  के आलम मे धन्य ने कहा .
           असल बात  धन्य  और नम्रता  कक्षा  6 वी से एक  ही विधालय मे पढते थे.दोनों की  गहरी दोस्ती  हो गई .  किसी  पार्टी  या  समारोह  में साथ -साथ  आने -जाने  लगे .जब ये सारी बात  नम्रता  के  पिता को  मालुम  हुआ  कि मेरी तीन -पांच मे आगे  है  अगर  उसे  दो -चार  लगा  दुंगा  तो कही नौ दो ग्यारह  ना हो जाए .इस  लिए  उन्होंने मतंग पुर के राज निहित  के लडके  से नम्रता  की शादी  तय कर दी . धन्य  नम्रता  को लेकर  न जाने कितने  सपने  संजोता . उन दोनो  का तार के  सहारे  ही  बात  होता था.फिरसे एक दिन  धन्य  तार के सहारे पुछा  कि जब तुम  मुझसे  इतना  बेइंतहा  प्यार  करती हो तो क्यों नही मेेेर  पास आ जाती ...और हमारे बीच  के  दूरि यो  को मिटा  देती. तुम  फिक्र  मत करो धन्य  मेरी पढाई जैसे ही पूरी होगी मै आजाऊॅगी. क्या  करुं  मुझे  भी  यहां एक पल अच्छा  नही लगता है  फिरभी  दिल के जख्मों  को  सी सी कर जी  रही हूं. नम्रता बोली .

         धन्य  ' अमीर  खान  की तरह  स्मार्ट  था. वह  हाथ मे चूड़ा और  टी- शर्ट आदि  पहनने का शौकीन  था . हर रोज सुबह     और शाम  आईने  के  साथ   काटता .एक दिन  हसी -खुशी  के  साथ  मस्त  माहौल  मे  बैैठकर  नम्रता  के साथ  गुजारे पलों  को याद  कर रहा था  कि वे भी कोई  दिन थे  जब  हम पहली बार किसी  पार्टी  मे मिले थे  लाल शूट पहने  मुझे  नम्रता भा गई थी .मुझे  ऐसा लग रहा था कि  मै ही  नम्रता  का  सच्चा  प्रेमी हूं. तभी  अचानक  फोन की घंटी बजी ...फोन  था  नम्रता  का.धन्य ने  फोन  उठाया  ..बोला  कैसे  नम्रता?  आ रही  हो न ?मै  बस तुम्हारा  ही इन्तजार  कर रहा हूं .क्या तुम  बिना बताए आकर के मुझे  सरप्राइज  देना चाहती हो ,  मै सब जानता हूं.धन्य और कुछ  कहता  इससे  पहले  की फोन कट चुकी थी फिर फोन  की घंटी  बजी ... इधर से धन्य  फोन  उठाते  ही पहले  जैसा  दुहराया ...बोला  -क्या हुआ  नम्रता  सब ठीक  तो है?  मगर  उधर से  जवाब  सुनते ही  धन्य सन्न रह गया वही  गिर पडा .   मानो उसके  चमकती  जिंदगी  मे अंधेरा छा  गया हो . ये तुने क्या  किया  नम्रता?  तुम  तो कहती थी हमारे  प्यार  के रंग  कभी नही  छुटेंगे...हमारे  रिश्ते  अटूट  है कभी  नही  टुटेंगे. क्या  तेरा ओ वादा ...ओ इरादा  सिर्फ  झूठे प्यार  का सौदा  था? ऐ दुनिया  वालो इस दुनिया  मे  अब  प्रेम ,प्रेम  नही  रहा  ...इक धोखा  बन गया है .जिसे अपना समझो वही  पराया हो जाता है .उन्होंने  तो  बङी  आसानी से कह दिया  ' आई हैट  यू '...  एक पल के लिए भी नही  सोचा  कि  हमारे   ऐसा  कहने से  उनके नाजुक  दिल पर  क्या  गुजरेगी? अब   हम किसके लिए इस जहां मे जीयेें ? तुने  क्योंकि  बेवफाई  नम्रता?  किसके लिए .. ?"अपनों के लिए ".खैर अब इन बातों से हमें क्या  लेना -देना  ?लेना देना  है  तो  अपने  सार्थक  सांसो  से ...जो  जीवन  जीने  की कला  सीखा   सके .






     

 

                                

Tuesday, November 8, 2016

जगत का जंजाल - संसृति

मनुष्यों को अपने हृदय की सुबुद्धि से दीपशिखा जलानी चाहिए। उन्हें एक-दूसरे के मध्य भेदभाव डालकर मौज-मस्ती नहीं करनी चाहिए। मौज-मस्ती दो पल की भूल है, उनकी कुबुद्धि का फल शूल है।
इस प्रकृति के ‘विशद-अंक’ में कलिकाल की संसृति का “श्रीगणेश” होता है; जहाँ सुख आने पर आनंद सुखित हो जाता है, वहीं दुख आने पर सुप्त-व्यथा जागृत होती है। उसी प्रकृति के विशद अंक में एक छोटा-सा गाँव है—दामनपुर, जो चारों ओर नदियों से घिरा हुआ है। कहीं–कहीं खुले मैदान हैं, तो किसानों का चाँद तोड़ने जैसा काम भी है। लोग अपनी–अपनी संस्कृति से जुड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। वहीं पथ के किनारे आम्र–पीपल के द्रुम लगे हुए हैं, जिससे शीतल समीर बह रही है और प्यारे अभिन्न निमग्न हो रहे हैं। वहाँ के अधिकांश ग्रामीण अल्पज्ञ हैं। वे किसी को ठेस लगाकर नहीं, अपितु खून-पसीना बहाकर अपनी जीविका चलाते हैं। वे अपने काम के आगे भगवान को स्मरण करना भूल जाते हैं; परेशानी सहन कर सकते हैं, किन्तु पराजित नहीं।"
 उसी गाँव में दानिक राम और भोजराम नामक दो भाई निवास करते हैं। वे दोनों भाई तो एक हैं, परंतु दोनों का स्वभाव एक जैसा नहीं है। पराई चीज़ों पर आँखें गड़ाना बड़े भाई दानिक राम का पेशा है। लालच ने उन्हें अंधा बना दिया है, मानो कुबेर का धन पाकर भी उन्हें संतोष नहीं और बगैर संतोष के लालच का नाश कहाँ? हाँ, छोटे भाई भोजराम शील-स्वभाव के हैं। उन्हें दुनिया का लालच नहीं है, सिर्फ़ दो वक़्त की रोटी पर भरोसा है। वे लक्ष्मण के चरण-चिह्नों पर चलने वाले हैं। उनके भीतर बड़े भाई के प्रति सेवा व समर्पण के भाव हैं। तभी तो वे दानिक राम के हर उड़ते तीर को झेलते रहे, पर उन्हें क्या पता कि वे राम न होकर एक प्रपंची ठहरे...।""
     असल में, दानिक राम अपने आप को छोटे भाई भोजराम की अपेक्षा ज़्यादा समृद्ध और संपन्न समझते हैं, परंतु उससे भी ज़्यादा उनमें अहंकार है। वे नित्य रामायण का पाठ भी करते हैं, तब भी तुलसीदास जी के उस महान सिद्धांत को भूल ही जाते हैं जिसमें लिखा है—सत्य वचन बोलना चाहिए, सत्य कर्म और सत्य विचार से रहना चाहिए। हाँ, वे इस सिद्धांत को पढ़ते ज़रूर हैं, किंतु इसे अपनी हकीकत की दुनिया में नहीं उतार पाते। वे दुनिया के श्रेष्ठ ग्रंथों में से एक ‘श्रीरामचरितमानस’ में यह भी पढ़ते हैं कि 'भाई की भुजा भाई ही होता है।' फिर उसी भाई से वैमनस्यता किसलिए? तू-तू, मैं-मैं क्यों?""
   माना कि दानिक राम के पास वैभव-वस्तु विपुल है, पर प्रलय की अपेक्षा जीवन तो नश्वर ही है न? फिर ऐसा अहंकार क्यों, मानो प्रलय के बाद भी जीवन का नाश नहीं होगा! दानिक राम के अहंकार-रूपी दीमक ने छोटे भाई के प्रेम-भाव-रूपी मखमल को चाट लिया है। वे यह समझ नहीं पा रहे हैं कि छोटे भाई भोजराम की झोपड़ी में अपनों का प्यार और दूसरों का आदर भी है। वे ग़रूर की आँखों से संसार को देखते हैं कि 'मेरे पास क्या नहीं है? सब कुछ तो है और उसके पास एक टूटी-फूटी झोपड़ी है, जिसमें खाने-पीने के लाले (तेरह-बाईस) पड़े हैं। वह तो भूख की मार से मारा-मारा फिरता है।' शायद बड़े भाई दानिक राम को संसार की वास्तविकता का ठीक-ठीक बोध नहीं है कि इस संसार में राजाओं का राज हो या धनवानों का धन, सब क्षणिक होता है। फिर गर्व किसलिए?"
"वे आधी खोपड़ी के जाहिल व्यक्ति हैं, जो साधारण सी ज़िंदगी को लेकर ऊँच-नीच के कार्य करते हैं। कभी किसी की जिल्लत करते हैं, तो कभी किसी पर इल्ज़ाम लगाते हैं; किन्तु जब इन कर्मों के परिणाम समीप आते हैं, तब वे चल नहीं पाते। जैसे-जैसे उनके जीवन की अंतिम घड़ियाँ आने लगती हैं, उनके जीवन का हर कर्म बोलने लगता है।दानिक राम के दो पुत्र हैं—कार्तिकेश्वर व अचिन्त कुमार। कार्तिकेश्वर एक शराबी है, जबकि अचिन्त कुमार सिविल कोर्ट, दामन पुर का मशहूर वकील है। उसकी नीति अलग ही है—‘वह सत्य का घोर विरोधी है।’ उसकी पत्नी अपाहिज है, जो पति के प्रपंचों के आगे परेशान रहती है, तब भी तन-मन-धन से पति के चरणों में प्रेम रखती है। वह एक धर्मपत्नी होने के नाते यह जानती है कि दान और तीर्थ से बढ़कर भी पति की सेवा है। एक दिन अनायास ही कार्तिकेश्वर शराब के नशे में मदमस्त होकर अपने काका भोजराम को मारने दौड़ा। अब भोजराम क्या करते? वे भागते-भागते पुलिस थाने जा पहुँचे। पुलिस आरक्षक ने देखते ही भोजराम को सलाम किया, क्योंकि वे गांधी टोपी और कुर्ता पहने हुए थे। तत्पश्चात, पुलिस ने कार्तिकेश्वर को दो हाथ लगाते हुए कारावास में डाल दिया, मानो दानिक राम के पहाड़ जैसे अहंकार को एक सबक मिल गया हो। लेकिन फूंक से पहाड़ कहाँ उड़ने वाला?"
"(कुछ दिनों बाद) जब वह जेलखाने से बाहर आया, तो पुनः वही बर्ताव करने लगा। आखिर कब तक? एक दिन दानिक राम की आँखों से ग़रूर का चश्मा उतर गया। अब उनके पास उस ग़रूर के चश्मे को पहनने के लिए आँखें ही नहीं रहीं, क्योंकि अचानक वकील अचिन्त कुमार इस दुनिया से चल बसा! उन्हें जिस धन-दौलत पर गर्व था, उसी धन-दौलत ने उनका साथ छोड़ दिया। फिर पैसा-पैसा किसलिए? क्या पैसों के बल पर यमराज ने वकील अचिन्त कुमार की जान बख़्शी? नहीं न! वे अपने बीते कल के कुकर्मों के कारण आने वाले कल को खो बैठे।
   जगत के जंजाल में आकर दानिक राम ने अपने पुत्र वकील अचिन्त कुमार को तो (मोह में) बाँध लिया था, किन्तु अपने अहंकार को नहीं बाँध पाए। इस जगत के ‘जंजाल’ में आकर अहंकार को नहीं, अपितु उस राम-नाम को भजना चाहिए, जिनका नाम ‘अनइच्छित हूँ अपवर्ग निसेही’ है। फिर अहंकार किसलिए? क्या केवल मायाजाल और मोहिनी में फँसने के लिए?प्रकृति के विशद अंक में कलिकाल की इस संसृति (भव, जन्म-मरण) का अंततः 'जय श्रीराम' हो जाता है।"

Monday, October 26, 2015

प्रेम - जगत १

प्रेम-जगत १
( 'प्रेम-जगत' संसार का रंगमंच है और हम सभी इस रंगमंच के पात्र हैं।)
विज्ञों का ऐसा मत है कि प्रेम की आग की उष्णता से सृष्टि की रचना हुई है। मनु और शतरूपा ने भाव-संवेदन से धड़कती 'प्रेम-भावना' के लिए, स्वर्ग के संवेदन-हित 'आनंद-रस' को नहीं, अपितु जगत के कठोर जीवन को अपनाया। 'ढोला-मारू, लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट और हीर-रांझा' की प्रेम-कथाएं तो यही रेखांकित करती हैं कि प्रेम ही जीवन का सार है, और प्रेम-विहीन जगत वीरान है। इसी प्रेम के वशीभूत होकर जगत बनाने वाले माता (प्रकृति) व पिता (पुरुष) ने जगत का निर्माण किया। अतः, उन्हें मेरा सहस्रों बार प्रणाम!
पारिवारिक सुख आकाश में घटाओं के सदृश होता है। सुख उत्पन्न तो होता है, पर चिरकाल तक स्थिर नहीं रहता; वह उन घटाओं के सदृश ही छिप जाता है।
   "वर्षों से मेरे आँगन में एक 'अंगना' (स्त्री) नहीं है, जिससे मेरा आँगन सूना है।" ऐसा ही विचार करके 'मनीलाल' अपने पुत्र (मधुसूदन) का विवाह कर रहे हैं। असल बात यह है कि मधुसूदन जब दस वर्ष का था, तब उसकी 'जन्म-जननी' दुनिया से चल बसी थीं। वह माँ की ममता को न पा सका; माँ की ममता उसके लिए आसमान के कुसुम जैसी हो गई।'मनीलाल' मंजोलगढ़ के एक ईमानदार पुरुष हैं। वे सबको 'एक आँख' से देखते हैं। पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी आँखों में खून उतर आता था; बस याद आती, तो कमर टूट जाती थी। बस उसी याद को भुलाने और दुःख के आँसुओं को सुख में बदलने के लिए ही वे अपने पुत्र का विवाह कर रहे हैं।मधुसूदन का विवाह सुमन के साथ हो रहा है। 'सुमन' एक सजीली लड़की है। वह विदित नारायण की पुत्री है। 'विदित नारायण' भले व नेक इंसान हैं। वे 'प्रेमगढ़' के कुशल व्यक्ति हैं। आखिरकार एक दिन मधुसूदन की बारात प्रेमगढ़ के लिए निकल पड़ती है और लोगों के इंतजार की घड़ियाँ खत्म हो जाती हैं।
       'प्रेमगढ़' एक मनभावन नगर है। , किन्तु 'मधुसूदन' की बारात ने उस नगर की ओर सजा दिया है उस जन -संकुल नगर में अति चहल - पहल है । मधुसूदन के माथे पर सुन्दर सेहरा है । जिससे मधुसूदन अति प्रसन्नचित है । वहां का विशद् ए नूर अनुपम है । धरती से आसमा तक शहनाइयों की ध्वनि गूंज रही है , तारे - गण आकाश में टिमटिमा रहे हैं मानों सबके खुशीयों में झूम रहे हों । (कुछ देर बाद) पुरोहितों द्वारा शिव ,गौरी व गणेश जी की पूजा कराइ जा रही है। वहीं सुहागिन स्त्रियों मंगल गान गा रहीं हैं । जिससे आये सभी कुटुम्ब जन आनंदित हो रहे हैं। (धीरे- धीरे द्वार चार की रीति- रस्म पूर्ण हो जाती हैं) वही एक सुंदर जनवास है जिसमे आये सभी बारातियों की मंडली क्रमशः बैठी है। उन सबकी नज़र (सामने) दूल्हे और दुल्हन पर एक टक लगी हैं । 'वे' सब उनके मुस्कान भरे चेहरे को देखकर बरबस ही मोहित हो रहें हैं। ख़ैर सुंदरता किसे नही मोहित कर लेती । 
       आज'सुमन' बारहों आभूषणों से सजी है। उसके पैरों में नूपुर के साथ किंकिणी है। उसके हाथों में कंगन के साथ चूड़ियाँ हैं। उसके गले में कंठश्री है। बाहों में बसेर-बिरिया के साथ बाजूबंद है। माथे पर सुंदर टीके के साथ शीश पर शीशफूल है। उसे देखकर ऐसा लग रहा है, मानो 'सुमन' नंदनवन की परी हो, जहाँ शृंगार-रस और सौंदर्य का मिलन हुआ हो।अब प्रभात की सुमधुर बेला में 'सुमन' और 'मधुसूदन' सात फेरों के पवित्र बंधन में बंध रहे हैं। उनके इस बंधन के साक्षी अग्निदेव हैं। वहीं, अपने कुल के अनुसार लाई-परछन और नेक-चार की रीतियाँ-रस्में पूर्ण हो रही हैं। हालांकि 'सुमन' का अपना कोई भाई नहीं है, फिर भी 'मंगला' नाम का व्यक्ति इसे अपना सौभाग्य मानकर अपने हाथों से सुंदर संबंध निभा रहा है; मानो सीता जी के लिए पृथ्वी के पुत्र मंगल ग्रह स्वयं आए हों।शनैः-शनैः विदाई की पुनीत घड़ी आन पड़ी है, जहाँ पूजनीय पिता 'विदित नारायण' के पाँव नहीं उठ रहे हैं और वे टस से मस नहीं हो पा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, माँ 'सुनैना' की ममता टूटकर बिखरी पड़ी है।'प्रेम-जगत' का प्रेम ही अजूबा है। जब 'सुमन' अपने पति के गले में वरमाला डाल रही थी, तब सबकी आँखें एकटक होकर उसकी ओर देख रही थीं। परंतु, अब सबकी आँखें नम हैं। किसी के मुख से कोई शब्द बोलते नहीं बन रहा है, मानो सौंदर्य ने शृंगार-रस छोड़कर शांत-रस को अपना लिया हो। जो 'सुमन' कल तक अपनी सखी-सहेलियों की प्रिया थी, अपने बाबुल की गुड़िया थी और बाबुल की प्रीत रूपी बाहों में झूलकर कली से सुमन बनी थी... आज वही सुमन बाबुल की प्रीत में मुरझाकर विदा हो रही है। खैर, बगैर मुरझाए सुमन को बहारों का सुख कहाँ मिलेगा? जब तक इस जगत में प्रेम रहेगा... तब तक सुमन को बहारों का सुख मिलता रहेगा।चंद लम्हों के बाद विदित नारायण अपने दिल के टुकड़े को विदा कर देते हैं। 'सुमन' आँखों ही आँखों में देखते-देखते प्रेमांगन से दूर चली जाती है।
                        प्रेम -जगत २
'मनीलाल' कृत- कृत्य हो गए , जो उनके वर्षो की सुनी आंगन में' सुमन 'का जो आगमन हुआ । इस जगत में प्रेम भी अपने वेष को बदलता रहता है । जो 'मनीलाल' कल तक लोगों की सलामती की कामना करते थे, वही 'मनीलाल' अनायास ही परलोक सिधार गए। सारा सुख, दुःख में बदल गया। जहाँ मधुसूदन की जिंदगी चाँदनी रातों के समान दमक रही थी, अब वहाँ खौफनाक अंधेरा छा गया है—सिर्फ अंधेरा… अब तो मधुसूदन पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा है। "अगर उसके मन में प्रसन्नता होती, तो रात का घना अंधेरा भी दीप्त हो उठता"; किन्तु यदि चाँदनी रातों पर ही दुःखों का साया पड़ जाए, तो उसे भला कौन रोशन करेगा?वहाँ मधुसूदन बिलख-बिलखकर रो रहा है। शोक की इस बेला में वहाँ एकत्र हुए सभी सज्जन विमन हैं। उन्हें  मधुसूदन का यह कारुणिक विलाप अच्छा नहीं लगता  वे कह उठते हैं -"मत रो मधुसूदन! जो होनहारी है,वह तो होगा ही।इस संसार में संयोग से मिलन होता है और वियोग से बिछड़ना। हाँ मधुसूदन यह जिन्दगी केवल रुदन के लिए नहीं है;जीवन का प्रवाह जैसा बहता है,तू बहने दे। किन्तु तू मत रो, रोना जगत के लिए पाप है।मृत्यु ही इस नश्वर संसार का अंतिम और शाश्वत सत्य है। यह रोने की घड़ी नहीं है। बाल्यकाल में जिन कंधो को हांथी, घोड़ा और पालकी बनाकर अपार आनंद उठाया था,आज उन्हीं कंधो का ऋण (मोल) अदा करना है। इसलिए तुम अपने पिता(मनीलाल )को कंधा दो।"
 मनीलाल केसिधारते ही घर की आर्थिक स्थिति दुरुस्त नहीं रही। जहाँ मधुसूदन ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहा था... अब वहीं वह पहाड़ खोद-खोदकर चुहिया निकालने लगा, जिससे प्रेम-जाल में बँधी पत्नी (सुमन) और पुत्र का पेट पल सके।आखिरकार एक दिन मधुसूदन घर की स्थिति को दुरुस्त करने के लिए घर से निकल गया, बहुत दूर... वह अपने जान से प्यारे पुत्र को ममत्व की छाँव में छोड़ गया, जहाँ माँ (सुमन) की ममता अपार थी और पुनीत गोद विशाल।ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है। जब मधुसूदन दो वर्ष तक घर नहीं आया, तब 'सुमन' नयन-जल लिए विलापने लगी— "ओह देव! क्या मेरे पतिदेव जगत में कुशल भी हैं या आपने उनसे मेरा नाता तोड़ दिया?" वह एक तरफ स्तम्भित होकर भगवान को दोष देती, तो वहीं दूसरी तरफ अनुसूया जैसी पतिव्रता नारी के धर्म का पालन भी करती।पर उसे मालूम नहीं कि इस संसार में कोई किसी को दुःख देने वाला नहीं है, सब अपने ही कर्मों का फल है। 'सुमन' चारदीवारी के बाहर, विवर्ण मुख और अधःशिर किए बैठी है। उसकी आँखें नम हैं व केश विच्छिन्न हैं, जिससे उसका मुख ढका है। है।" सूर्य की लालिमा उसके तन पर पड़ रही है, तब भी वह दुखों के काले सागर में डूबी जा रही है; मानो अब उस अबला के लिए तड़पना ही उसका सफर बन गया हो। वह जैसे पति-प्रतीक्षा में बिकल है, वैसे ही प्रकृति भी अपनी अनमोल छटा से विचल है। वह बार-बार विधाता को दोष देती है और कहती है— "हाँ देव! तू सच-सच बता... तूने मेरे ख्वाबों और इरादों को पत्थर तो नहीं बना दिया? क्या सूर्य के बिना दिन और चंद्रमा के बिना रात शोभा पा सकते हैं? नहीं न... फिर मैं अपने पति के बिना कैसे शोभा पा सकती हूँ? क्या तुझे एक-दूजे की जुदाई का तजुर्बा नहीं? अगर नहीं, तो इस 'प्रेम-जगत' में 'आ'... और आकर देख... तेरी बनाई इस कठोर धरती पर, तेरा यह मिट्टी का खिलौना (पुतला) प्रेम के लिए कितना 'अधीर' है कि काश हमें मुट्ठी भर प्रेम मिल जाता, तो हमारे इस मिट्टी के खिलौने में जान आ जाती।"आगे वह कहने लगी— "जब 'अब दिन फिरेंगे' तो मैं जी भरकर देखूँगी। हाँ देव! अब विलम्ब न कर... उन्हें घर की चौखट तक ला दे। यह तुमसे मेरा आर्तनाद है और एक दुहाई भी। हाँ, लोगों को यह भ्रम है कि मैंने अपने पति (मधुसूदन) को घर से तू-तू, मैं-मैं करके और मुँह फुलाकर निकाल दिया है; पर तुम तो सर्वज्ञ हो, तुम्हें मालूम है कि मैंने उन्हें सप्रेम गले मिलकर किस्मत बनाने और जिंदगी सँवारने के लिए भेजा है।"
  अतः ये आँखें उनकी प्रतीक्षा में कब से राह सजाए खड़ी हैं। अंततः एक दिन मधुसूदन बीते हुए मौसम की तरह अपनी पत्नी सुमन के पास लौट आया और पति से गले लगते ही सुमन झूम उठी; मानो बहारों के आने पर मुरझाई कली खिल रही हो।
मधुसूदन ने हँसते हुए पूछा— "क्या हुआ सुमन? तुम इतनी बेचैन क्यों हो? क्या मैं इस 'प्रेम-जगत' में आकर सचमुच खो गया था? अगर हाँ, मैं खो गया था, तो क्या मेरा प्रेम भी इस जगत से खो गया था?" इन सवालों के जवाब सुमन न दे सकी और अपनी बहारों में महकने लगी।
                                         शिवराज आनंद
     


सोनपुर महिमा काव्य

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