न 'बदले' की भावना से


बदले की सुलगती आग में, तुम ख़ुद को न जलाना,
प्रतिशोध की इस तीव्र आँधी में, न विवेक को गँवाना।
जो बोए शूल राहों में, उसे तुम माफ़ कर देना,
कटुता के घने अंधियारे में, स्नेह का दीप जलाना।
प्रतिशोध से न आज तक कोई सुखी हुआ है,
मानवता का आँचल बस क्षमा से ही धुला है।
ये नफ़रत मन को डसती है, इसे तुम पास न लाना,
क्षमा की पावन सरिता में, बैर का मैल बहाना।
जहाँ प्रतिशोध की चेतना, वहाँ श्मशान होता है,
क्षमा की छाँव में ही तो, सुखी इनसान होता है।
मिटाकर बैर के छालों को, तुम बस प्रेम को चुनो,
हृदय में जिसके करुणा हो, वही भगवान होता है।

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