देवीपुर के शांत वादियों में आकर हर मन संवरता है।
जहाँ प्रकृति खुद करती है आदि-शक्ति का वंदन पल-पल,
माँ महामाया के चरणों में आकर जग का दुख बिसरता है।
चैत्र और शारद नवरात्रों में पावन उल्लास झलकता है,श्रद्धा की अविरल धाराओं से मंदिर का प्रांगण महकता है।
मिट जाता है मन का तम (अँधेरा) जब जलते हैं ज्योति-कलश,माँ के दिव्य भवन का कोना-कोना तेज से दमकता है।
जो भी व्यथित हृदय लेकर माँ के पावन दरबार में आता है,
वो करुणा की शीतल छांव तले जीवन का परम सुख पाता है।
कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटता यहाँ से,श्रद्धा का एक छोटा सा आँसू भी यहाँ मुराद बन जाता है।
मुख्य नगर से चार किलोमीटर दूर बसा यह धाम निराला है,जिसने भी देखा माँ का स्वरूप, वो ममता का मतवाला है।
सूरजपुर का यह मुकुट दिव्य, अध्यात्म की पावन गंगा है,इस महातीर्थ ने सदियों से हर भक्त का भाग्य सँभाला है ।।
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